रविवार, 31 जनवरी 2021

BHAGAVAD GITA

🙏🙏 यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः। 

धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत।।४५।।🙏🙏 

यदि :-यदि; माम :-मुझको; अप्रतिकारम :-प्रतिरोध न करने के कारण; अशस्त्रं:-बिना हथियार के; शस्त्रपाणय:-शस्त्रधारी;धार्तराष्ट्राः -धृतराष्ट्र के पुत्र; रणे:-युद्धभूमि में; हन्युः -मारे; तत :-वह; में :-मेरे लिए; क्षेम -तरम:-श्रेयस्कर; भवेत :-होगा। 

यदि शस्त्रधारी धृतराष्ट्र पुत्र मुझ निहत्थे तथा रणभूमि में प्रतिरोध न करने वालों को मारें,तो यह मेरे लिए श्रेयस्कर होगा। 

तात्पर्य :-क्षत्रियों के युद्ध -नियमों के अनुसार ऐसी प्रथा है कि निहत्थे तथा विमुख शत्रु पर आक्रमण न किया जाय। किन्तु अर्जुन ने निश्चय किया कि शत्रु भले ही इस विषम अवस्था में उस पर आक्रमण कर दे ,किन्तु वह युद्ध नहीं करेगा।  उसने इस पर विचार नहीं किया कि दूसरा दल युद्ध के लिए कितना उद्दत है। इन सब लक्षणों कारण उसकी दयार्द्रता है जो भगवान् के महान भक्त होने  कारण उत्पन्न हुई 

क्रमशः !!!

शनिवार, 30 जनवरी 2021

BHAGAVAD GITA 1:44

 अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम। 

यद्राज्यसुखलोभेन हन्तु स्वजनमुद्द्ताः।।४४।।  

अहो:-ओह; बत :-कितना आश्चर्य है यह; महत:-महान; पापम:-पाप कर्म; कर्तुम:-करने के लिए; व्यवसिता:-निश्चय किया है; वयम:-हमने; यत :-क्यों; राज्य -सुख -लोभेन :-राज्य -सुख के लालच में आकर; हन्तुम:-मारने के लिए; स्व-जनम :-अपने सम्बन्धियों को;उद्द्ता:-तत्पर। 

ओह ! कितने आश्चर्य की बात है की हम सब जघन्य पापकर्म करने के लिए उद्दत हो रहे हैं। राज्य सुख भोगने की इच्छा से प्रेरित हो कर हम अपने ही सम्बन्धियों को मारने पर तुले हुए हैं। 

अर्थात :- स्वार्थ के वशीभूत होकर मनुष्य अपने सगे भाई,बाप, या माँ  के वध जैसे पापकर्मों में प्रवृत हो सकता है। विश्व के इतिहास में ऐसे अनेक उदहारण मिलते हैं। किन्तु भगवान् का साधु भक्त होने के कारण अर्जुन सदाचार के प्रति जागरूक है। अतः वह ऐसे कार्यों से बचने का प्रयत्न करता है। 

क्रमशः !!!

शुक्रवार, 29 जनवरी 2021

BHAGVAD GITA 1:43

 उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दनः। 

नरके नियतं वासो भवतीत्यनुश्रुश्रुम।।४३।।  

उत्सन्न:-विनष्ट; कुल-धर्मणाम:-पारिवारिक परम्परा वाले; मनुष्याणां:-मनुष्यों का; जनार्दन:-हे कृष्ण; नरके:-नरक में; नियतं :-सदैव; वास:-निवास; भवति:-होता है; इति :-इस प्रकार; अनुश्रुश्रुम:-गुरु परम्परा से मैंने सुना है। 

हे प्रजापालक कृष्ण ! मैंने गुरु परम्परा से सुना है कि जो लोग कुल-धर्म का विनाश  करते हैं, वे सदैव नरक में वास करते हैं। 

अर्थात :-अर्जुन अपने तर्कों को अपने निजी अनुभव पर न आधारित करके आचार्यों से जो सुन रखा है उस पर आधारित है। वास्तविक ज्ञान प्राप्त करने की यही विधि है। जिस व्यक्ति ने पहले से ज्ञान प्राप्त कर रखा है उस व्यक्ति की सहायता के बिना कोई भी वास्तविक ज्ञान तक नहीं पहुंच सकता। वर्णाश्रम -धर्म की एक पद्धिति के अनुसार मृत्यु के पूर्व मनुष्य को पापकर्मों के लिए प्रायश्चित करना होता है। जो परमात्मा है उसे इस विधि का अवश्य उपयोग करना चाहिये। ऐसा किये बिना मनुष्य निश्चित रूप से नरक भेजा जायेगा जहां उसे अपने पापकर्मों के लिए कष्टमय जीवन बिताना होगा। 

क्रमशः !!! 

गुरुवार, 28 जनवरी 2021

BHAGAVAD GITA 1:42

 दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसङ्गरकारकैः। 

उत्साद्यन्ते जातिधर्मा: कुलधर्माश्च शाश्वतः।।४२।। 

दोषैः -ऐसे दोषों से;एतैः-इन सब; कुलघ्नानां :-परिवार नष्ट करने वालों का;वर्णसङ्कर:-अवांछित संतानों के;कारकैः- कारणों से;उत्साद्यन्ते:-नष्ट हो जाते हैं; जाति-धर्माः :-सामुदायिक योजनाएं; कुल-धर्मा:-पारिवारिक परम्पराएं; च :- भी;शाश्वतः -सनातन। 

जो लोग कुल-परम्परा को विनष्ट करते हैं और इस तरह अवांछित संतानों को जन्म देते हैं उनके दुष्कर्मों से समस्त प्रकार की सामुदायिक योजनाएं तथा पारिवारिक कल्याण -कार्य विनष्ट हो जाते हैं। 

अर्थात :-सनातन धर्म या वर्णाश्रम -धर्म  द्वारा निर्धारित मानव समाज के चारों वर्णों के लिए सामुदायिक योजनाएं तथा पारिवारिक कल्याण -कार्य इसलिए नियोजित है कि मनुष्य चरम मोक्ष प्राप्त कर सके। अतः समाज के अनुत्तरदायी नायकों द्वारा सनातन धर्म परम्परा के बिखंडन से उस समाज में अव्यवस्था फैलती है,फलस्वरूप लोग जीवन के उद्देश्य विष्णु को भूल जाते हैं। ऐसे नायक अंधे कहलाते हैं और जो लोग इनका अनुगमन करते हैं वे निश्चय ही कुव्यवस्था की ओर अग्रसर होते हैं। 

कर्मशः !!!

बुधवार, 27 जनवरी 2021

BHAGAVAD GITA-1:41

सङ्करो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च। 

पतन्ति पितरों ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः।।४१।।  

सङ्कर:-ऐसे अवांछित बच्चे; नरकाय:-नारकीय जीवन के लिए; एव :-निस्चय ही; कुलघ्नानाम:-कुल का वध करने वालों के; कुलस्य:-कुल के; च:-भी; पतन्ति:-गिर जाते हैं; पितरः -पितृगण; हि :-निश्चय ही; एषाम:-इनके; लुप्त :-समाप्त; पिण्ड:-पिंड अर्पण की; उदक:-तथा जल की; क्रियाः -क्रिया,कृत्य। 

अवांछित संतानों की वृद्धि से निश्चय ही परिवार के लिए तथा पारिवारिक परम्परा को विनष्ट करने वालों के लिए नारकीय जीवन उत्पन्न होता है। ऐसे पतित कुलों के पुरखे ( पितर लोग )गिर  जाते हैं क्योंकिउन्हें जल तथा पिण्ड दान देने की क्रियाऐं समाप्त हो जाती हैं।

अर्थात :-सकाम कर्म के विधीविधानों के अनुसार कुल के पितरों को समय -समय पर जल तथा पिंड दान दिया जाना चाहिए। यह दान विष्णु पूजा द्वारा किया जाता है क्योंकि विष्णु को अर्पित भोजन के उच्छिस्ट भाग ( प्रसाद )के खाने से सारे पापकर्मों से उद्धार हो जाता है। कभी-कभी पितरगण विविध प्रकार के पापकर्मों से ग्रस्त हो सकते हैं और कभी -कभी उनमे से कुछ को स्थूल शरीर प्राप्त न हो सकने के कारण उन्हें प्रेतों के रूप में सूक्ष्म शरीर धारण करने के लिए बाध्य होना पड़ता है। अतः जब वंशजों द्वारा पितरों को बचा प्रसाद अर्पित किया जाता है तो उनका प्रेतयोनि या अन्य प्रकार के दुखमय जीवन से उद्धार होता है। पितरों को इस तरह की सहायता पहुँचाना कुल परम्परा है और जो लोग भक्ति का जीवन यापन नहीं करते उन्हें ये अनुष्ठान करने होते हैं। केवल भक्ति करने से मनुष्य सैकड़ों क्या हजारों पितरों को ऐसे संकटों से उबार सकता है। 

देवर्षि भूताप्तनृणाम  पितृणां 

                न किंकरो नायमृणी  च राजन। 

सर्वात्मना  य: शरणं  शरण्यं 

                   गतो मुकंदं  परिहत्य कर्तम।। (भागवत ११.५.४१ )

"जो पुरुष अन्य समस्त कर्तव्यों को त्याग कर मुक्ति के दाता मुकुंद के चरण कमलों की शरण ग्रहण करता है और इस पथ पर गंभीरता पूर्वक चलता है वह देवताओं,मुनियों,सामान्य जीवों,स्वजनों,मनुष्यों या पितरों के प्रति अपने कर्तव्य या ऋण से मुक्त हो जाता है। "श्री भगवान् की सेवा करने से ऐसे दायित्व अपने आप दूर हो जाते हैं। 

क्रमशः !!! 

मंगलवार, 26 जनवरी 2021

BHAGVAD GITA-1:40

अधर्माभिभत्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रिय।



स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णशंकरः 

अधर्म :-अधर्म; अभिभवात:-प्रमुख होने से; कृष्ण:-हे कृष्ण; प्रदुष्यन्ति:-दूषित हो जाती है; कुल-स्त्रिय:-कुल की स्त्रियां; स्त्रीषु :-स्त्रीत्व के; दुष्टासु:-दूषित होने से; वार्ष्णेय:-हे वृष्णिवंशी:-जायते:-उत्त्पन्न होती है; वर्णशंकर:-अवांछित संतान। 

हे कृष्ण ! जब कुल में अधर्म प्रमुख हो जाता है तो कुल की स्त्रियां दूषित हो जाती हैं और स्त्रीत्व के पतन से हे वृष्णिवंशी ! अवांछित संताने उत्पन्न होती है। 

अर्थात :-   जीवन में शांति,सुख तथा आध्यत्मिक उन्नति का मुख्य सिद्धांत मानव समाज में अच्छी संतान का होना है। वर्णाश्रम धर्म के नियम इस प्रकार बनाये गये थे कि राज्य तथा जाति की आध्यात्मिक उन्नति के लिए समाज में अच्छी संतान उत्पन्न हो। ऐसी संतान समाज में स्त्री के सतीत्व और उसकी निष्ठा पर निर्भर करती है। जिस प्रकार बालक सरलता से कुमार्गगामी बन जाते हैं उसी प्रकार स्त्रियां भी पतोन्मुखी हो जाती हैं। अतः बालकों  तथा स्त्रियों दोनों को ही समाज के वयोवृद्धों का संरक्षण आवश्यक है। स्त्रियां विभिन्न धार्मिक प्रथाओं में संलग्न रहने पर व्यभिचारिणी नहीं होंगी। 

चाणक्य पंडित के अनुसार सामान्यतया स्त्रियां अधिक बुद्धिमान नहीं होती अतः वे विश्वसनीय नहीं हैं। इसलिए उन्हें विवध कुल परम्पराओं में व्यस्त रहना चाहिए और इस तरह उनके सतीत्व तथा अनुरक्ति से ऐसी संताने जन्मेंगी जो वर्णाश्रम धर्म में भाग लेने योग्य होगी। ऐसे वर्णाश्रम धर्म के विनाश से यह स्ववाभिक है कि स्त्रियां स्वतंत्रतापूर्वक पुरुषों से मिल सकेंगी और व्यभिचार को प्रश्रय मिलेगा जिससे अवांछित संताने उत्पन्न होंगी। निठल्ले लोग भी समाज में व्यभिचार को प्रेरित करते हैं और इस तरह अवांछित बच्चों की बाढ़ आ जाती है जिससे मानव जाति पर युद्ध और महामारी का संकट छा जाता है।  

क्रमशः !!!


 


सोमवार, 25 जनवरी 2021

BHAGVAD GITA- 1:39

🙏 कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः । 

धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मो भिभवत्युत।।३९।।🙏

कुल-क्षये:-कुल  होने पर; प्रणश्यन्ति :-विनष्ट हो जाती है; कुल -धर्मा :-पारिवारिक परम्पराएं; सनातनाः-शाश्वत; धर्मे :-धर्म; नष्टे :-नष्ट होने पर; कुलम:-कुल को; कृत्स्नम:-सम्पूर्ण; अधर्मः-अधर्म; अभिभवति:-बदल देता है; उत :-कहा जाता है। 

कुल का नाश होने पर सनातन कुल-परम्परा नष्ट हो जाती है  तरह शेष कुल भी अधर्म में प्रवृत हो जाता है। 

अर्थात :-वर्णाश्रम व्यवस्था में धार्मिक परम्पराओं के अनेक नियम हैं जिनकी सहायता से परिवार के सदस्य ठीक से उन्नति करके आध्यात्मिक मूल्यों की उपलब्धि कर सकते हैं। परिवार में जन्म  लेकर मृत्यु तक के सारे संस्कारों के लिए वयोवृद्ध लोग उत्तरदायी होते हैं। किन्तु इन वयोवृद्धों की मृत्यु के पश्चात संस्कार सम्बन्धी पारिवारिक परम्पराएं रुक जाती हैं,और परिवार के जो तरुण सदस्य बचे रहते हैं वे अधर्ममय व्यसनों में प्रवृत से मुक्ति-लाभ से वंचित रह सकते हैं। अतः किसी भी कारणवश परिवार के वयोवृद्धों का वध नहीं होना चिहिए। 

क्रमशः !!!  

 

रविवार, 24 जनवरी 2021

BHAGVAD GITA 1:37

 यद्द्प्येते न पश्यन्ति लोभोपहचेतसः।

कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोही च पातकम।।३७।।

कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुं। 

कुलक्षयकृत दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन।।३८।। 

यदि :-यदि; अपि:-भी; एते:-ये; न:-नहीं; पश्यन्ति:-देखते हैं; लोभ :-लोभ से; अपहत :-अभिभूत; चेतसः :-चित वाले; कुल-क्षय:-कुल -नाश; कृतम:-किया हुआ; दोषम :-दोष को; मित्र द्रोहे:-मित्रों से विरोध करने में; च :-भी; पातकम:-पाप को;कथम:- क्यों; न:-नहीं; ज्ञेयम:-जानना चाहिए; अस्माभिः :- हमारे द्वारा; पापत :- पापों से; अस्मात:- इन; निवर्तितुम:-बंद करने के लिए; कुल-क्षय:-वंश का नाश; कृतम:-हो जाने पर; दोषम:- अपराध; प्रपश्यद्भि :-देखने वालों के द्वारा; जनार्दन :- हे कृष्ण !

हे जनार्दन ! यद्द्पि लोभ से अभिभूत चित्त वाले लोग अपने परिवार को मारने या अपने मित्रों से द्रोह करने में कोई दोष नहीं देखते,किन्तु हम लोग,जो परिवार के विनष्ट करने में अपराध देख सकते हैं,ऐसे पापकर्मो में क्यों प्रवृत्त हों ?

अर्थात:- क्षत्रिय से यह आशा नहीं की जाती कि वह अपने विपक्षी दल द्वारा युद्ध करने या जुआ खेलने का आमंत्रण दिए जाने पर मना  करे। ऐसी अनिवार्यता में अर्जुन लड़ने से नकार नहीं सकता क्योंकि उसको दुर्योधन के दल ने ललकारा था। इस प्रसंग में अर्जुन ने विचार किया कि हो सकता है कि दूसरा पक्ष इस ललकार के परिणामो के प्रति अनभिज्ञ हों। किन्तु अर्जुन को दुष्परिणाम दिखाई पड़ रहे थे अतः वह इस ललकार को स्वीकार नहीं कर सकता। यदि परिणाम अच्छा हो तो कर्तव्य वस्तुतः पालनीय है, किन्तु यदि परिणाम विपरीत हो तो हम उसके लिए बाध्य नहीं होते। इन पक्ष- विपक्षों पर विचार करके अर्जुन ने युद्ध न करने का निश्चय किया। 

क्रमशः !!!

  


शनिवार, 23 जनवरी 2021

BHAGVAD GITA 1:36

 पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनः। 

तस्मान्नाहा वयम हन्तु धार्तराष्ट्रान्सबान्धवान। 

स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव।।३६।।  

पापम :-पाप;  एव:-निस्चय ही; आश्रयेत:-लगेगा; आस्मान:हमको; हत्वा:-मारकर; एतान:-इन सब;आततायिनः-आततायियों को; तस्मात्:-अतः; न:-कभी नहीं; अर्हा:-योग्य; वयम  :-हम; हन्तुम:-मारने लिए; धार्तराष्ट्रान:-धृतरास्ट्र के पुत्रों को; सबान्धवान:-उनके मित्रों सहित; स्वजनम:-कुटुम्बियों को; हि :-निश्चय ही; कथम:- कैसे; हत्वा:-मारकर; सुखिनः-सुखी; स्याम:-हम होंगे; माधवः -हे लक्ष्मीपति कृष्ण। 

यदि हम ऐसे आततायियों का वध करते हैं तो हम पर पाप चढ़ेगा, अतःयह उचित नहीं होगा कि हम धृतरास्ट्र के पुत्रों तथा उनके मित्रों का वध करें। हे लक्ष्मीपति कृष्ण ! इससे हमें क्या लाभ होगा ? और अपने ही कुटम्बियों को मार कर हम किस प्रकार सुखी हो सकते हैं ?

अर्थात :-वैदिक आदेशानुसार आततायी छः प्रकार के होते हैं -१. विष देने वाला, २. घर में अग्नि लगाने वाला, ३. घातक हथियार से आक्रमण करने वाला, ४. धन लूटने वाला, ५. दूसरे की भूमि हड़पने वाला,तथा ६. पराई स्त्री का अपहरण करने वाला। ऐसे आततायियों का तुरंत वध कर देना चाहिए क्योंकि इनके वध से कोई पाप नहीं लगता। आततायियों का इस तरह वध करना किसी सामान्य व्यक्ति को शोभा दे सकता है,किन्तु अर्जुन कोई सामान्य व्यक्ति नहीं है। वह स्वाभाव से साधु है अतः वह उनके साथ साधुवत व्यवहार करना चाहता था। किन्तु इस प्रकार का व्यवहार क्षत्रिय के लिए उपयुक्त नहीं है। यद्द्पि राज्य के प्रशासन के लिए उत्तरदायी व्यक्ति को साधु की प्रकृति का होना चाहिये, किन्तु उसे कायर नहीं होना चाहिए। उदाहरणार्थ ,भगवान् राम इतने साधु थे कि आज भी लोग रामराज्य में रहना चाहते हैं,किन्तु उन्होंने कभी कायरता प्रदर्शित नहीं की। रावण आततायी तह क्योंकि वह राम की पत्नी सीता का अपहरण करके ले गया था,किन्तु राम ने उसे ऐसा पाठ पढ़ाया कि जो विश्व -इतिहास में बेजोड़ है। अर्जुन के प्रसंग में विशिष्ट प्रकार के आततायियों से भेंट होती है -ये हैं उसके निजी पितामह,आचार्य, मित्र, पुत्र,पौत्र इत्यादि। इसलिए अर्जुन ने विचार किया कि उनके प्रति वह सामान्य आततायियों जैसा कटु व्यवहार न करे। इसके अतिरिक्त, साधु पुरुषों को तो क्षमा करने की सलाह दी जाती है। साधु पुरुषों के लिए ऐसे आदेश किसी राजनैतिक आपातकाल से अधिक महत्व रखते हैं। इसलिए अर्जुन ने विचार किया कि राजनितिक कारणों से स्वजनों का वध करने की अपेक्षा धर्म तथा सदाचार की दृष्टि से उन्हें क्षमा कर देना श्रेयकर होगा। अतः क्षणिक शारीरिक सुख के लिए इस तरह वध करना लाभप्रद नहीं होगा। अन्ततः जब सारा राज्य तथा उससे प्राप्त सुख स्थाई नहीं है तो फिर अपने स्वजनों को मारकर वह अपने ही जीवन तथा शास्वत मुक्ति को संकट में क्यों डाले? अर्जुन द्वारा कृष्ण को "माधव"अथवा "लक्ष्मीपति" के रूप में सम्बोधित करना भी सार्थक है। वह लक्ष्मीपति कृष्ण को यह बताना चाह रहा था वे  कि उसे ऐसा काम करने के लिए प्रेरित न करें, जिससे अनिष्ट हो। किन्तु कृष्ण कभी भी किसी का अनिष्ट नहीं चाहते, भक्तों का तो कदापि नहीं। 

क्रमशः !!!💓💔💗❤   

      

    

शुक्रवार, 22 जनवरी 2021

BHAGVAD GITA 1:32

 कि नो राज्येन गोविन्द कि भोगैर्जीवितेन वा। 

येषामर्थे काङ्क्षितम नो राज्यम भोगाः सुखानी च।।३२।।

त इमेवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च। 

आचार्यः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः।।३३।। 

मातुला: श्वसुराः पौत्राः श्यालाः सम्बन्धिनस्तथा।

एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्रतोपि मधुसूदन।। ३४।।  

अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते। 

निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्यात्तजनार्दनः।।३५।।

किम: -क्या लाभ;  न:-हमको; राज्येन: -राज्य से; गोविन्द: -हे कृष्ण; किम: -क्या; भोगै: -भोग से; जीवितेन:- जीवित रहने से; वा :-अथवा; येषां :- जिनके; अर्थे :- लिए; काङ्क्षितम:-इच्छित है; नः -हमारे द्वारा; राज्यम:-राज्य; भोगाः :-भौतिक भोग; सुखानी -समस्त सुख; 
च :-भी; ते :-वे ;  इमे :-ये; अवस्थिता: -स्थित; युद्धे :-युद्ध भूमि में; प्राणान:-जीवन को ; त्यक्त्वा:-त्याग कर; धनानि:-धन को; च:-भी; आचार्याः- गुरुजन; पितरः पितृगण; पुत्राः :-पुत्रगण ; तथा :-और; एव:-निश्चय ही; च:- भी; पितामहाः -पितामह; मातुलाः -मामा लोग; 
श्वसुराः-श्वसुर; पौत्राः-पौत्र; श्यालाः-साले; संबन्धिनः- सम्बन्धी; तथा एतान :-ये सब; न:-कभी नहीं; हन्तुम :-मारना; इच्छामि:-चाहता हूँ;  घृत:मारे जाने पर; अपि:-भी; मधुसूदन:-हे मधु असुर के मारने वाले कृष्ण;अपि:-तो भी; त्रैलोक्य :-तीनों लोकों के;राज्यस्य:- राज्य के; हेतोः- विनिमय में; किम नु:-क्या कहा जाय; महीकृते:-पृथ्वी केलिए;निहत्य:-मारकर; धार्तराष्ट्रान :-धृतरास्ट्र के पुत्रों को; नः-हमारी; का :-क्या; प्रीति:-प्रसन्नता; स्यात :-होगी; जनार्दन :-हे जीवों के पालक। 

हे गोविन्द ! हमें राज्य,सुख अथवा इस जीवन से क्या लाभ ! क्योंकि  जिन सारे लोगों के लिए हम उन्हें चाहते हैं वे ही इस युद्ध भूमि में खड़े हैं।  

हे मधुसूदन !जब गुरुजन,पितृगण,पुत्रगण,पितामह,मामा,ससुर,पौत्रगण,साले तथा अन्य सारे सम्बन्धी अपना -अपना धन एवं प्राण देने के लिए तत्पर हैं और मेरे सक्षम खड़े हैं तो फिर मैं इन सबको क्यों मारना चाहूंगा,भले ही वे मुझे क्यों न मार डालें ? हे जीवों के पालक ! मैं इन सबों से लड़ने को तैयार नहीं, भले ही बदले में मुझे तीनों लोक क्यों न मिलते हों,इस पृथ्वी की तो बात छोड़ दें। भला ध्रतराष्ट्र के पुत्रों को मारकर हमें कौन सी प्रसन्नता मिलेगी ?

अर्थात :-

अर्जुन ने भगवान् कृष्ण को गोविन्द कह कर सम्बोधित किया क्योंकि वे गौओं तथा इन्द्रयों के समस्त प्रसन्नता के विषय हैं। इस विशिष्ट शब्द का प्रयोग करके अर्जुन संकेत करता है कि कृष्ण यह समझें कि अर्जुन की इन्द्रयाँ कैसे तृप्त होंगी। किन्तु गोविन्द हमारी इन्द्रयों को तुष्ट करने के लिए नहीं हैं। हाँ यदि हम गोविन्द की इन्द्रयों को तुष्ट करने का प्रयास करते हैं तो हमारी इन्द्रियां स्वतः तुष्ट होती हैं। भौतिक दृष्टि से प्रत्येक व्यक्ति अपनी इन्द्रयों को तुष्ट करना चाहता है और चाहता है की ईश्वर उसके आज्ञापालक की तरह काम करे। किन्तु ईश्वर उनकी तृप्ति वहीँ तक करते हैं जितने के वे पात्र होते हैं -उस हद तक नहीं जितना वे कहते हैं। किन्तु जब कोई इसके विपरीत मार्ग ग्रहण करता है अर्थात जब वह अपनी इन्द्रियों की तृप्ति की चिंता न करके गोविन्द की इद्रियों की तुष्टि करने का प्रयास करता है तो गोविन्द की कृपा से जीव की सारी  इच्छाएं पूर्ण हो जाती हैं। यहाँ पर जाती तथा कुटुम्बियों के प्रति अर्जुन का प्रगाढ़ स्नेह आंशिक रूप से इन सबके प्रति उसकी स्वाभाविक करुणा के कारण हैं। अतः वह युद्ध करने के लिए तैयार नहीं है। 

हर व्यक्ति अपने बैभव का प्रदर्शन अपने मित्रों तथा परिजनों के समक्ष करना चाहता है,किन्तु अर्जुन को भय है कि उसके सारे मित्र तथा परिजन युद्धभूमि में मारे जायेंगे  और वह विजय के पश्चात उनके साथ अपने बैभव का उपयोग नहीं कर सकेगा। भौतिक जीवन का यह सामान्य लेखा जोखा है। किन्तु  आध्यात्मिक जीवन इससे सर्वदा भिन्न होता है। चूंकि भक्त भगवान् की इच्छाओं की पूर्ति करना चाहता है अतः भगवद इच्छा होने पर वह भगवान् की सेवा के लिए ऐश्वर्य स्वीकार कर सकता है, किन्तु यदि भगवद इच्छा न हो तो वह एक पैसा भी ग्रहण नहीं कर सकता अर्जुन अपने सम्बन्धियों को मारना नहीं चाह रहा था और यदि उनको  मारने की  आवश्यकता हो तो अर्जुन की इच्छा थी की कृष्ण स्वयं उनका वध करे। इस समय उसे यह पता नहीं है की कृष्ण उन सबों को युद्धभूमि में आने से पूर्व ही मार चुके हैं और उसे निमित मात्र बनना है। इसका विवरण अगले अध्यायों में होगा। .भगवान् का असली भक्त होने के कारण अर्जुन अपने अत्याचारी बंधु-बांधवों से प्रतिशोध नहीं लेना चाहते, किन्तु भगवान् दुष्टों द्वारा भक्त के उत्पीड़न को सहन नहीं कर पाते। भगवान् किसी व्यक्ति को अपनी इच्छा से क्षमा कर सकते हैं, किन्तु यदि कोई उनके भक्तों को हानि पहुंचाता है तो वे उसे क्षमा नहीं कर सकते। इसलिए भगवान् इन दुराचारियों को वध करने के लिए उद्धत थे यद्धपि अर्जुन उन्हें क्षमा करना चाहता था। 

क्रमशः !!!!     🙏🙏🙏                                                       

  

गुरुवार, 21 जनवरी 2021

BHAGVAD GITA 1:31

 न च श्रेयोनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे। 

न काङ्गे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानी च।। ३१।।

🙏🙏

न :-न तो; च -भी; श्रेय:-कल्याण; अनुपश्यामि :-पहले से देख रहा हूँ; हत्वा :-मार कर; स्वजनम:-अपने सम्बन्धियों को; आहवे:-युद्ध में ; न :-न तो; काङ्गे :-आकांक्षा करता हूँ; विजयम:-विजय;कृष्ण :-हे कृष्ण; न :-न तो; च :-भी; राज्यम :-राज्य; सुखानी :-उसका सुख; च :- भी। 

हे कृष्ण ! इस युद्ध में अपने ही स्वजनों का वध करने से न तो मुझे कोई अच्छाई दिखती है और न,मैं उससे किसी प्रकार की विजय,राज्य या सुख की इच्छा रखता हूँ।

अर्थात :- यह जाने बिना कि मनुष्य का स्वार्थ विष्णु या कृष्ण में है, सारे बद्धजीव शारीरिक सम्बन्धों के प्रति यह सोचकर आकर्षित होते हैं की वे ऐसी परिस्थितियों में प्रसन्न होंगे। ऐसी देहात्मबुद्धि के कारण वे भौतिक सुख के कारणों को भी भूल जाते हैं। अर्जुन तो क्षत्रिय का नैतिक धर्म भी भूल गया था। कहा जाता है कि दो प्रकार के मनुष्य परम शक्तिशाली तथा जाज्वल्यमान सूर्यमण्डल में प्रवेश करने के योग्य होते हैं। ये हैं -एक तो क्षत्रिय जो कृष्ण की आज्ञा से युद्ध में मरता है तथा दूसरा सन्यासी जो आध्यात्मिक अनुशीलन में लगा रहता है। अर्जुन अपने शत्रुओं को भी मारने से विमुख हो रहा है,अपने सम्बन्धियों  की तो बात छोड़ दें। वह सोचता है कि स्वजनों को मारने से उसे जीवन में सुख नहीं मिल सकेगा। अतः वह लड़ने के लिए इच्छुक नहीं है,जिस प्रकार की भूख न लगने पर कोई भोजन बनाने को तैयार नहीं होता। उसने तो वन जाने का निश्चय लिया है,जहाँ वह एकांत में निराशपूर्ण जीवन काट सके। किन्तु क्षत्रिय होने के नाते उसे अपने जीवन निर्वाह के लिए राज्य चाहिए क्योंकि क्षत्रिय कोई अन्य कार्य नहीं कर सकता। किन्तु अर्जुन के पास राज्य कहाँ है ? उसके लिए तो राज्य प्राप्त करने का एकमात्र अवसर है के अपने बंधु-बांधवों से लड़कर अपने पिता के राज्य का उत्तराधिकार प्राप्त करे, जिसे वह करना नहीं चाह रहा है। इसलिए वह अपने को जंगल में एकांतवास करके निराशा का एकांत जीवन बिताने योग्य समझता है। 

क्रमशः !!!  

  


बुधवार, 20 जनवरी 2021

BHAGVAD GITA - 1.30

 न च शक्रोम्यवस्थातुं भ्र्मतीव च में मनः। 

निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशवः।। ३०।। 

न -नहीं; च -भी; शक्रोमि -समर्थ हूँ; अवस्थातुम -खड़े होने में; भ्र्मति -भूलता हुआ; इव -सदृश्य; च -तथा; में -मेरा; मनः-मन; निमित्तानि -कारण; च -भी; पश्यामि -देखता हूँ; विपरीतानि-बिल्कुल  उल्टा; केशव -केशी असुर को मारने  वाले कृष्ण। 

मैं यहाँ अब और अधिक खड़ा रहने में असमर्थ हूँ। मैं अपने को भूल रहा  हूँ और मेरा सिर चकरा रहा है। हे कृष्ण ! मुझे तो केवल अमंगल के कारण दिख रहे हैं। 

अर्थात :- अपने अधैर्य के कारण अर्जुन युद्ध भूमि में खड़ा रहने में असमर्थ था और अपने मन की दुर्बलता के कारण उसे आत्मविस्मृति हो रही थी। भौतिक वस्तुओं के प्रति अत्यधिक आसक्ति के कारण मनुष्य ऐसी मोहमयी स्थिति में पड़ जाता है। भयं द्वितीयाभिनिवेशतः स्यात -ऐसा भय तथा मानसिक अंसतुलन उन व्यक्तियों में उत्पन्न होता है,जो भौतिक परिस्थितियों से ग्रस्त होते हैं। अर्जुन को युद्ध भूमि में केवल दुखदायी पराजय प्रतीत हो रही थी -वह शत्रु पर विजय पाकर भी सुखी नहीं होगा। निमित्तानि विपरीतानि  शब्द महत्वपूर्ण हैं। जब मनुष्य को अपनी आशाओं में केवल निराशा दिखती है  सोचता है "मैं यहाँ क्यों हूँ ?"प्रत्येक प्राणी अपने में तथा अपने स्वार्थ में रुचि रखता है। किसी को भी परमात्मा में रूचि नहीं  होती। कृष्ण की इच्छा से अर्जुन अपने स्वार्थ के प्रति अज्ञान दिखा रहा है। मनुष्य का वास्तविक स्वार्थ तो विष्णु या कृष्ण में निहित है। बद्धजीव भूल जाता है इसलिए उसे भौतिक कष्ट उठाने पड़ते हैं अर्जुन ने सोचा कि उसकी विजय केवल उसके शोक का कारण बन सकती है। 

क्रमशः !!!

मंगलवार, 19 जनवरी 2021

BHAGVAD GITA

 वेपथुरश्च शरीरे में रोमहर्षश्च जायते। 

गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते।।२९।।

वेपथुः-शरीर का कम्पन; च-भी; शरीरे-शरीर में; में -मेरे; रोम -हर्ष:-रोमांच; च -भी; जायते- उत्पन्न हो रहा है; गाण्डीवं -अर्जुन का धनुष,गांडीव; संस्रते- छूट या सरक रहा है; हस्तात -हाथ से; त्वक -त्वचा; च -भी; एव-निश्चय ही; परिदह्यते-जल रही है। 

मेरा सारा शरीर काँप रहा है,मेरे रोंगटे खड़े हो रहे हैं,मेरा गांडीव धनुष मेरे हाथ से सरक रहा है और मेरी त्वचा जल रही है। 

अर्थात :-शरीर में दो प्रकार का कम्पन होता है और रोंगटे भी दो प्रकार से खड़े होते हैं। ऐसा या तो आध्यात्मिक परमानन्द के समय या भौतिक परिस्थितियों में अत्यधिक भय उत्पन्न होने पर होता है। दिव्य साक्षात्कार में कोई भय नहीं होता। इस अवस्था में अर्जुन के जो लक्षण हैं वे भौतिक भय अर्थात जीवन की हानि के कारण हैं। अन्य लक्षणों से भी यह स्पष्ट है,वह इतना अधीर हो गया कि उसका विख्यात धनुष गांडीव उसके हाथों से सरक रहा था और उसकी त्वचा में जलन हो रही थी। ये सब लक्षण देहात्मबुद्धि से जन्य हैं। 

क्रमशः !!!

  

सोमवार, 18 जनवरी 2021

BHAGVAD GITA

 तान्समीक्ष्य स कौन्तेय: सर्वान्बन्धूनवस्थितान। 

कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत।।२७।।

तान :-उन सब को; समीक्ष्य :-देखकर; सः -वह; कौन्तेय -कुन्तीपुत्र; सर्वान:-सभी प्रकार के;बंधून:-सम्बन्धियों को; अवस्थितान -स्थित;  कृपया - दयावश; परया-अत्यधिक; अविष्ट: -अभिभूत; विषीदन -शोक करता हुआ; इदम-इस प्रकार; अब्रवीत- बोला। 

 जब कुन्तीपुत्र अर्जुन ने मित्रों तथा सम्बन्धियों की इन बिभिन्न श्रेणियों को देखा तो वह करुणा से अभिभूत हो गया और इस प्रकार बोला। 

अर्जुन उवाच 

दृष्टेमम स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम। 

सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिश्रुस्यति।। २८।। 

अर्जुन उवाच -अर्जुन ने कहा; दृष्टा:-देखकर; इमम -इन सारे; स्वजनम-सम्बन्धियों को; कृष्ण -हे कृष्ण; युयुत्सुम -युद्ध की इच्छा रखने वाले; समुपस्थितम -उपस्थित; सीदन्ति -काँप रहे हैं; मम -मेरे; गात्राणि -शरीर के अंग; मुखम - मुहं; च - भी; परिशयुष्यति- सूख रहा है। 

अर्जुन ने कहा -हे कृष्ण ! इस प्रकार युद्ध की इच्छा रखने वाले अपने मित्रों तथा सम्बन्धियों को अपने समक्ष उपस्थित देखकर मेरे शरीर के अंग काँप रहे हैं और मेरा मुहं सूखा जा रहा है। 

अर्थात :-यथार्थ भक्ति से युक्त मनुष्य में सारे सद्गुण रहते हैं.जो सत्पुरषों या देवताओं में पाए जाते हैं, जबकि अभक्त अपनी शिक्षा तथा संस्कृति के द्वारा भौतिक योग्यताओं में चाहे कितना ही उन्नत क्यों न हो इन ईश्वरीय गुणों से विहीन होता है। अतः स्वजनों, मित्रों तथा सम्बन्धियों को युद्धभूमि में देखते ही अर्जुन उन सबों के लिए करुणा से अभिभूत हो गया ,जिन्होंने परस्पर युद्ध करने का निस्चय किया था। जहाँ तक उसके अपने सैनिकों का सम्बन्ध था, वह उनके प्रति प्रारम्भ से ही दयालु था, किन्तु बिपक्षी दल के सैनिकों की आसन्न मृत्यु को देखकर वह उन पर भी दया का अनुभव कर रहा था। और जब वह इस प्रकार सोच रहा था तो उसके अंगों में कम्पन होने लगा और मुहं सूख गया। 

उन सबको युद्धभिमुख देखकर उसे आष्चर्य भी हुआ। प्रायः सारा कुटुम्ब, अर्जुन के सगे सम्बन्धी उससे युद्ध करने आये थे। यद्द्पि इसका उल्लेख नहीं है, किन्तु तो भी सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि न केवल उसके अंग काँप रहे थे और मुहं सूख रहा था अपितु वह दयावश रुदन भी कर रहा था अर्जुन में ऐसे लक्षण किसी दुर्बलता के कारण नहीं अपितु ह्रदय की कोमलता के कारण थे, जो भगवान् के शुद्ध भक्त का लक्षण है। अतः कहा गया है। 

यस्यास्ति भक्तिर्भगवत्तिञ्चिना                                                     

सर्वगुणैस्तत्र  समासते सुराः। 

                      हरावभक्तस्य कुतो महद्गुणा 

मनोरथेनासती धावतो बहिः।। 

जो भगवान् के प्रति अविचल भक्ति रखता है उसमे देवताओं के सद्गुण पाए जाते हैं। किन्तु जो भगवद्भक्त नहीं हैं उसके पास भौतिक योग्यताएं ही रहती हैं जिनका कोई मूल्य नहीं होता है। इसका कारण यह है कि वह मानसिक धरातल पर मँडराता रहता है और ज्वलन्त माया के द्वारा अवश्य ही आकृष्ट होता है (भागवत ५.१८.१२.)

क्रमशः !!!!

  

                           

रविवार, 17 जनवरी 2021

BHAGVAD GITA

 तत्रापश्यत्स्थितानपार्थ: पितृनथ पितामहान। 

आचार्यान्मातुलानभृतृन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा। 

श्र्वश्रुरान्सुहृदयेचैव सेनयोरुभयोरपि।।२६।।   

     तत्र- वहां अपश्यत -देखा;स्थितान -खड़े;पार्थ -पार्थ ने; पितृन -पितरों (चाचा ताऊ )को ; अथ-भी;पितमहान -पितामहों को; आचार्यान -शिक्षकों को; मातुलान -मामाओं को;भ्रातृन-भाइयों को; पुत्रान -पुत्रों को;सखीन -मित्रों को; तथा-और; श्र्वश्रुरान-श्र्वसुरों को;सुह्रद: -शुभचिंतकों को; च-भी; एव निश्चय ही; सनयोः -सेनाओं के; उभयोः -दोनों पक्षों की; अपि-सहित। 

  अर्जुन ने वहां पर दोनों पक्षों की सेनाओं के मध्य में अपने चाचा-ताऊओं,पितामहों, गुरुओं, मामाओं, भाइयों, पुत्रों, पौत्रों,मित्रों, ससुरों,और शुभचिंतकों को भी देखा। 

अर्थात :-अर्जुन युद्ध भूमि में अपने सभी सम्बन्धियों को देख सका। वह अपने पिता के समकालीन भूरिश्रवा जैसे व्यक्तियों को, भीष्म तथा सोमदत्त जैसे पितामहों, द्रोणाचार्य तथा कृपाचार्य जैसे गुरुओं, शल्य तथा शकुनि जैसे मामाओं,दुर्योधन जैसे भाइयों ,लक्ष्मण जैसे पुत्रों,अश्वथामा जैसे मित्रों एवं कृतवर्मा जैसे शुभचिंतकों को देख सका। वह उन सेनाओं को भी देख सका,जिनमें उसके अनेक मित्र थे। 

क्रमशः !!!

शनिवार, 16 जनवरी 2021

BHAGVAD GITA

 भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम । 

उवाच पार्थ पश्यैतान्समवेतांकुरुनीति।।२५।।

भीष्म -भीष्म पितामह ; द्रोण -गुरु द्रोण; प्रमुखतः-के समक्ष; सर्वेषाम -सबों के; च -भी; महीक्षिताम -संसार भर के राजा; उवाच -कहा; पार्थ। हे पृथा के पुत्र; पश्य -देखो; एतान -इन सबों को; समवेतान-एकत्रित; कुरुन -कुरुवंश के सदस्यों को; इति -इस प्रकार। 

भीष्म,द्रोण तथा विश्व भर के अन्य समस्त राजाओं के सामने भगवान् ने कहा कि हे पार्थ !यहाँ पर एकत्र सारे कुरुओं को देखो। 

अर्थात-समस्त जीवों के प्र्मात्मास्वरूप भगवान् कृष्ण यह जानते थे कि अर्जुन के मन में क्या बीत रहा है। इस प्रसंग में हृषिकेश शब्द का प्रयोग सूचित करता है कि वे सब कुछ जानते थे। इसी प्रकार पार्थ शब्द अर्थात प्रथा  कुन्तीपुत्र भी अर्जुन के लिए प्रयुक्त होने के कारण महत्वपूर्ण है। मित्र के रूप में वे अर्जुन को बता देना चाहते थे कि चूँकि अर्जुन उनके पिता वसुदेव की बहन पृथा का पुत्र था इसलिए उन्होंने अर्जुन का सारथी बनना स्वीकार किया था। किन्तु जब उन्होंने अर्जुन से "कुरुओं को देखो" कहा तो इससे उनका क्या अभिप्राय था? क्या अर्जुन वहीँ पर रूक कर  युद्ध करना नहीं चाहता था ? कृष्ण को अपनी बुआ पृथा के पुत्र से कभी भी ऐसी आशा नहीं थी। इस प्रकार से कृष्ण ने अपने मित्र की मनःस्थिति की पूर्वसूचना परिहासवश दी है। 

क्रमशः !!! 

 

शुक्रवार, 15 जनवरी 2021

BHAGVAD GITA

 सञ्जय उवाच

एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत। 

सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम।।२४।। 

सञ्जय उवाच-संजय ने कहा; एवम-इस प्रकार; उक्तः-कहे गये; हृषिकेश:-भगवान् कृष्ण ने; गुडाकेशेन-अर्जुन द्वारा; भारत-हे भरत के वंशंज; सेनयो:-सेनाओं के; उभयो-दोनों; मध्ये :-मध्य में; स्थापयित्वा -खड़ा करके; रथ-उत्तमम:-उस उत्तम रथ को। 

संजय ने कहा - भारतवंशी !अर्जुन द्वारा इस प्रकार सम्बोधित किये जाने पर भगवान् कृष्ण ने दोनों दलों के बीच में उस उत्तम रथ को लाकर खड़ा कर दिया। 

अर्थात -इस श्लोक में अर्जुन को गुडाकेश कहा गया है। गुडा का अर्थ नींद से है और जो नींद को जीत लेता है वह गुडाकेश है। नींद का मतलब अज्ञान से है। अतः अर्जुन ने कृष्ण की मित्रता के कारण नींद तथा अज्ञान दोनों पर विजय प्राप्त की थी। कृष्ण के भक्त के रूप में वह कृष्ण को क्षण नहीं भुला पाया क्योंकि भक्त का  स्वभाव ही ऐसा होता है। यहाँ तक कि चलते अथवा सोते समय भी कृष्ण के नाम,रूप,गुणों तथा लीलाओं के चिंतन से भक्त कभी मुक्त नहीं रह सकता। अतः कृष्ण का भक्त उनका निरंतर चिंतन करते हुए नींद था अज्ञान दोनों को जीत सकता है। इसी को कृष्णभावनामृत या समाधि कहते हैं। प्रत्येक जीव की इन्द्रियों तथा मन के निर्देशक अर्थात हृषिकेश के रूप में कृष्ण अर्जुन के मंतव्य को समझ गये कि वह क्यों सेनाओं के मध्य में रथ को खड़ा करवाना चाहता है। ,अतः उन्होंने वैसा ही किया और फिर वे इस प्रकार बोले। 

क्रमश !!!

 

गुरुवार, 14 जनवरी 2021

BHAGVAd GITA

योत्स्यमानानवेक्षेहं य एतेत्र समागताः। 

धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः।।२३।। 

योत्स्यमानान -युद्ध करने वालों को; अवेक्षे - देखूं; अहम् - मैं; ये -जो; एते -वे;अत्र -यहाँ,समागताः- एकत्र; धार्तराष्टस्य -धृतराष्ट्र के पुत्र की;दुर्बुद्धे-दुर्बुद्धि; युद्धे:-युद्ध में, प्रिय-मंगल, भला; चिकीर्षवः -चाहने वाले। 

मुझे उन लोगों को देखने दीजिये,जो यहाँ पर धृतराष्ट्र के दुर्बुद्धि पुत्र (दुर्योधन) को  प्रसन्न करने की इच्छा से लड़ने के लिए आये  हुए हैं। 

अर्थात :-यह सर्वविदित था कि दुर्योधन अपने पिता धृतराष्ट्र की सांठ गाँठ से पापपूर्ण योजनाए बनाकर पांडवों के राज्य को हड़पना चाहता था। अतः जिन समस्त लोगों ने दुर्योधन का पक्ष ग्रहण किया था वे उसी के सामानधर्मा रहे होंगें। अर्जुन युद्ध प्रारम्भ होने के पूर्व यह तो जान लेना चाहता था कि कौन -कौन से लोग आये हुए हैं। किन्तु उन के समक्ष समझौता का प्रस्ताव रखने की उसकी कोई योजना नहीं थी। यह भी तथ्य था कि वह उनकी शक्ति का, जिसका उसे सामना करना था,अनुमान लगाने की दृष्टि से उन्हें देखना चाह रहा था,यद्द्पि उसे अपनी विजय का विश्वास था क्योंकि कृष्ण उसकी बगल में विराजमान थे। 

क्रमशः-!!!!!  

 



बुधवार, 13 जनवरी 2021

BHAGVAD GITA

 अर्जुन उवाच 

सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेच्युत। 

यावदेत्तातृक्षेहं योद्धुकामानवस्थितान।। २१।। 

कैर्मया योद्धव्यमस्मिन्रणसमुद्द्मे।।२२।। 

अर्जुनः उवाच-अर्जुन ने कहा; सेनयो -सेनाओं के; उभयो:-दोनों; मध्ये-बीच में; रथम-रथ को स्थापय -कृपया खड़ा करें; में -मेरे; अच्युत -हे अच्युत; यावत् - जब तक; एतान-इन सब;निरीक्षे- देख सकूँ; अहम्-मैं; योद्धु कामान-युद्ध की इच्छा रखने वालों को; अवस्थितान -युद्धभूमि में एकत्र; कैः -किन -किन से; मया -मेरे द्वारा; सह-एक साथ;योद्धव्यम-युद्ध किया जाना है; अस्मिन- इस; रण-संघर्ष के; समुद्द्मे -उद्द्म या प्रयास में। 

अर्जुन ने कहा- अच्युत ! कृपा करके  मेरा रथ दोनों सेनाओं के बीच ले चलें जिससे मैं यहाँ उपस्थित युद्ध की अभिलाषा रखने वालों को और शस्त्रों की इस महान परीक्षा में, जिनसे मुझे संघर्ष करना है, उन्हें देख सकूँ। 

अर्थात -यद्यपि श्रीकृष्ण साक्षात श्री भगवान् हैं, किन्तु वे अहैतुकी कृपावश अपने मित्र की सेवा में लगे हुए थे। वे अपने  भक्तों पर स्नेह दिखाने में कभी नहीं चूकते इसलिए अर्जुन ने उन्हें अच्युत कहा है। सारथी रूप में उन्हें अर्जुन  आज्ञा का पालन करना था और उन्होंने इसमें कोई संकोच नहीं किया, अतः उन्हें अच्युत कह कर सम्भोदित किया गया है।  यद्द्पि उन्होंने अपने भक्त का सारथी पद स्वीकार किया था,किन्तु उनकी परम स्थिति अक्षुण बनी रही प्रत्येक परिस्थिति में वे इन्द्रयों के  स्वामी श्री भगवान हृषिकेश हैं। भगवान् तथा  उनके सेवक का सम्बन्ध अत्यंत मधुर एवं दिव्य होता है। सेवक स्वामी की सेवा करने के लिए सदैव उद्द्त रहता है और  भगवान् भी भक्त की कुछ न कुछ सेवा करने की कोशिस में लगे  रहते हैं। वे इसमें विशेष आनंद का अनुभव करते हैं कि वे स्वयं आज्ञादाता बने अपितु उनके शुद्ध भक्त उन्हें आज्ञा दें। चूँकि वे स्वामी हैं,अतः सभी लोग उनके आज्ञापालक हैं और उनके ऊपर उनको आज्ञा देने वाला कोई नहीं है। किन्तु जब वे देखते हैं कि उनका शुद्ध भक्त आज्ञा दे रहा है उन्हें दिव्य आनंद मिलता है यद्द्पि वे समस्त परिस्थितियों में  अच्युत रहने वाले हैं। 

 भगवान् का शुद्ध भक्त होने के कारण  अर्जुन को  बन्धु  -बान्धवों से युद्ध करने की तनिक भी इच्छा न थी,किन्तु दुर्योधन  के द्वारा शांतिपूर्ण समझौता न करके हठधर्मिता पर उतारू होने के कारण उसे युद्धभूमि में आना पड़ा। अतः वह यह जानने के लिए अत्यंत उत्सुक था की युद्धभूमि में कौन -कौन से अग्रणी व्यक्ति उपस्थित हैं। यद्द्पि युद्धभूमि में शांति-प्रयासों  का कोईं प्रश्न नहीं उठता तो भी वह उन्हें फिर से  देखना चाह रहा था कि वे इस अवांछित  युद्ध पर किस हद तक तुले हुए हैं।

क्रमशः !!!           


मंगलवार, 12 जनवरी 2021

BHAGVAD GITA

अथ व्यवस्थितान्दृष्टा धार्तराष्ट्रान्कपिध्वजः। 

         प्रविर्ते शस्त्रसम्पाते धनुर्द्धधम्म पाण्डवः। 

हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते।।  २०।। 

अथ :-तत्पश्चात; व्यवस्थितांन -स्थित;  दिर्ष्टा-देखकर; धार्तराष्ट्रान -धृतराष्ट्र  के पुत्रों को; कपि ध्वजः-जिसकी पताका पर हनुमान अंकित हैं; प्रविर्ते -कटिबद्ध; शस्त्र सम्पाते -बाण चलाने के लिए; धनुः-धनुष; उद्यम्य-ग्रहण करके,उठाकर; पाण्डवः -पाण्डुपुत्र अर्जुन ने; हृषीकेशं भगवान् कृष्ण से; तदा -उस समय; वाक्यम-वचन; इदम -ये ; आह -कहे; महीपते -हे राजा। 

उस समय हनुमान से अंकित ध्वजा लगे रथ पर आसीन पाण्डुपुत्र अर्जुन अपना धनुष उठाकर तीर चलाने के लिए उद्यत हुआ। हे राजन !धृतरास्ट्र  के पुत्रों को व्यूह में खड़ा देखकर अर्जुन ने श्रीकृष्ण  ये वचन कहे। 

अर्थात :-युद्ध प्रारम्भ होने ही वाला था। उपर्युक्त कथन से ज्ञांत होता है कि पांडवों की सेना की अप्रत्याशित व्यवस्था से धृतरास्ट्र  के पुत्र बहुत कुछ निरुत्साहित थे क्योंकि युद्ध भूमि में पांडवो का निर्देशन भगवान् कृष्ण के आदेशानुसार हो रहा था। अर्जुन की ध्वजा पर हनुमान का चिन्ह भी विजय का सूचक है क्योंकि हनुमान ने राम रावण युद्ध  में राम की सहायता की थी जिससे राम विजयी हुए थे। इस समय अर्जुन की सहायता के लिए उनके रथ पर राम तथा हनुमान दोनों उपस्थित थे। भगवान् कृष्ण साक्षात राम है और जहाँ भी राम रहते हैं  वहां उनका नित्य सेवक  होता है तथा उनकी नित्यसंगनी,वैभव की देवी सीता उपस्थित रहती हैं। 

अतः अर्जुन  के लिए किसी भी शत्रु से भय का कोई कारण  नहीं था। इससे भी अधिक इन्द्रियों के स्वामी  भगवान् कृष्ण निर्देश  देने के लिए साक्षात उपस्थित थे। इस प्रकार अर्जुन को युद्ध करने  के मामले में सारा सत्यपरामर्श प्राप्त था। ऐसी स्थितियों में,जिनकी व्यवस्था भगवान् ने अपने शाश्वत भक्त के लिए की थी, निश्चित ही विजय के लक्षण स्पष्ट थे।  

क्रमशः !!!!

सोमवार, 11 जनवरी 2021

BHAGVAD GITA

 सः घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत। 

नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलोभ्यनुनादायन।। १९।। 

सः -उस; घोष -शब्द ने; धार्तराष्ट्राणां:-ध्रतराष्ट्र के पुत्रों के; हृदयानि :-ह्रदय को  व्यदारयत:-विदीर्ण कर दिया; नभः -आकाश; च-भी; पृथ्वीम- पृथ्वी तल को; च -भी; एव -निश्चय ही; तुमुल -कोलाहलपूर्ण; अभ्यनु-नादायन :-प्रतिध्वनित करता। 

इन विभिन्न शंखों की ध्वनि कोलाहलपूर्ण बन गई जो आकाश तथा पृथ्वी को शब्दायमान करती हुई धृतराष्ट्र के पुत्रों के ह्रदयों को विदीर्ण करने लगी। 

अर्थात :-जब भीष्म तथा दुर्योधन के पक्ष के अन्य वीरों ने अपने -अपने शंख बजाये तो पांडवों के ह्रदय विदीर्ण नहीं हुए। ऐसी घटनाओं का वर्णननहीं मिलता, किन्तु इस विशिस्ट श्लोक में कहा कि पांडव पक्ष के शंखनाद से धृतराष्ट्र के पुत्रों के ह्रदय विदीर्ण हो गये। इसका कारण स्वयं पांडव और भगवान् कृष्ण में उनका विश्वास है। परमेस्वर की शरण ग्रहण करने वाले को किसी प्रकार का भय नहीं रह जाता,चाहे वह कितनी ही बिपत्ति में क्यों न हो। 

क्रमशः !!!!

रविवार, 10 जनवरी 2021

BHAGVAD GITA

 अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः। 

नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ।। १६।। 

काश्यश्च परमेष्वासः शिखंडी च महारथः। 

धृष्टधुम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः।। १७।। 

द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथ्वीपते। 

सौभद्रश्च महाबाहुः शङ्खान्दध्मुः पृथक्पृथक।।१८।। 

अनन्तविजयं -अनंतविजय नाम का शंख ; कुन्तीपुत्रो -कुंती के पुत्र; युधिष्ठिरः युधिष्ठिर नकुलः -नकुल; सहदेवः-सहदेव ने; च -तथा; सुघोषमणिपुष्पकः -सुघोष तथा मणिपुष्पक नामक शंख; काश्य-काशी के राजा ने; च -तथा; परम-इषु -आस:-महान धनुर्धर; शिखंडी -शिखंडी ने; च -भी ; महारथः-हजारों से अकेले लड़ने वाले; धृष्टधुम्न -राजा द्रुपद के पुत्र ने; विराट -विराट देश के राजा;च -भी; सात्यकि -सात्यकि,(युयुधान  श्रीकृष्ण के साथी ) च -तथा; अपराजितः -कभी न जीता जाने वाला (सदा विजयी ) द्रुपदः -द्रुपद,पंचाल के राजा ने; द्रोपदेयाः -द्रोपदी के पुत्रो ने; च-भी;सर्वशः -सभी; पृथ्वीपते -हे राजा; सौभद्रः-सुभद्रा के पुत्र अभिमन्यु ने; च-भी; महबाहुः विशाल भुजाओं वाला; शंखन -शंख; दध्मुः -बजाये; पृथक -पृथक :-अलग-अलग। 

हे राजन !कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर ने अपना अनंतविजय नामक शंख बजाया तथा नकुल और सहदेव ने सुघोष एवं मणिपुष्पक शंख बजाये। महान धनुर्धर काशिराज,परम योद्धा शिखंडी,धृष्टधुम्न ,विराट,अजेय सात्यकि द्रुपद,द्रोपदी के पुत्र,तथा सुभद्रा के महाबाहु पुत्र अदि सबों ने अपने-अपने शंख बजाये। 

अर्थात:-संजय ने राजा धृतराष्ट्र को अत्यंत चतुराई से यह बताया कि पाण्डु के पुत्रों को धोखा देने तथा राज्यसिंहासन पर अपने पुत्रों को आसीन कराने की यह अविवेकपूर्ण नीति सराहनीय नहीं थी। लक्षणों से पहले से ही यह सूचित हो रहा था कि इस महायुद्ध में सारा कुरुवंश मारा जायेगा। भीष्मपितामह से लेकर अभिमन्यु तथा अन्य पौत्रों तक विश्व के अनेक देशों के राजाओं समेत उपस्थित सारे के सारे लोगों का विनाश निश्चित था। यह सारी दुर्घटना राजा धृतराष्ट्र के कारण होने जा रही थी क्योंकि उसने अपने पुत्रों की कुनीति को प्रोत्साहन दिया था। 

क्रमशः !!!!

शनिवार, 9 जनवरी 2021

BHAGVAD GITA

 पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः। 

पौण्ड्रं दध्मौ महाशंखम भीमकर्मा वृकोदरः।।१५।।  

पाञ्चजन्यं-पांचजन्य नामक ; हृषिकेश -कृष्ण जो भक्तों की इन्द्रियों को निर्देश करते है ने ; देवदत्तं -देवदत्त नामक शंख ; धनञ्जयः -अर्जुन धन को जीतने वाला ने ; पौण्ड्रं -पौण्ड्र नामक शंख ; दध्मौ -बजाया ; महाशंखं -भीषण शंख ;भीमकर्मा -अतिमानवीय कर्म करने वाले ; वृक उदर :-(अतिभोजी )भीम ने। 

भगवान्  कृष्ण ने अपना पाञ्चजन्य  शंख बजाया ,अर्जुन ने देवदत्त शंख तथा अतिभोजी एवं अतिमानवीय कार्य करने वाले भीम ने पौण्ड्र नामक शंख बजाया। 
अर्थात:- यहाँ पर भगवान् कृष्ण को हृषिकेश कहा गया है क्योंकि वे ही समस्त इन्द्रियों के स्वामी है। सारे जीव उनके भिन्नांश है अतः जीवों की इन्द्रियां भी उनकी इन्द्रियों के अंश है। चूँकि निर्विशेषवादी जीवों की इन्द्रियों का कारण बताने में असमर्थ हैं इसलिए वे जीवों को इन्द्रियरहित या निर्विशेष कहने के लिए उत्सुक रहते हैं। भगवान् समस्त जीवों के हृदयों में स्थित होकर उनकी इन्द्रयों का निर्देशन करते हैं। किन्तु वे इस तरह निर्देशन करते हैं की जीव उनकी शरण ग्रहण कर ले और विशुद्ध भक्त की इन्द्रयों का तो वे प्रत्यक्ष निर्देशन करते है। यहाँ कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि में भगवान् कृष्ण अर्जुन की दिव्य इन्द्रयों का निर्देशन करते हैं इसलिए उनको हृषिकेश कहा गया है। भगवान् के विविध कार्यों के अनुसार उनके भिन्न -भिन्न नाम हैं। 

उदाहरणार्थ,इनका एक नाम मधुसूदन है क्योंकि उन्होंने मधु नाम के असुर को मारा था ,वे गौवों तथा इन्द्रयों को आनंद देने के कारण गोविन्द कहलाते हैं ,वसुदेव के पुत्र होने के कारण इनका नाम वासुदेव है ,देवकी को माता रूप में स्वीकार करने के कारण इनका नाम देवकीनंदन है ,वृंदावन में यशोदा के साथ बाल -लीलायें करने के कारण ये यशोदानन्दन हैं ,अपने मित्र अर्जुन का सारथी बनने के कारण पार्थसारथी हैं। इसी प्रकार उनका एक नाम हृषिकेश है ,क्योंकि उन्होंने कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल में अर्जुन का निर्देशन किया। 

इस श्लोक में अर्जुन को धनञ्जय कहा है क्योंकि जब इनके बड़े भाई को विभिन्न यज्ञ संपन्न करने के लिए धन की आवश्यकता हुई थी तो उसे प्राप्त करने में इन्होने सहायता की थी। इसी प्रकार भीम वृकोदर कहलाते है क्योंकि जैसे वे अधिक खाते हैं उसी प्रकार वे अति मानवीय कार्य करने वाले हैं ,जैसे हिडिम्बासुर का वध। अतः पांडवों के पक्ष में श्रीकृष्ण इत्यादि विभिन्न व्यक्तियों द्वारा विशेष प्रकार के शंखों का बजाया जाना युद्ध करने वाले सैनिकों के लिए अत्यंत प्रेरणाप्रद था। विपक्ष में ऐसा कुछ न था,न तो परम निदेशक भगवान् कृष्ण थे ,न ही भाग्य की देवी श्री थीं। अतः युद्ध में उनकी पराजय पूर्वनिश्चित थी-शंखों की ध्वनि मानो यही सन्देश दे रही थी। 

शुक्रवार, 8 जनवरी 2021

BHAGVAD GITA

ततः श्वेतेह्येरयुक्ते महती स्यन्दने स्थितौ। 

माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शंखो प्रदध्मतुः।। १४।।

ततः-तत्पश्चात; श्वेतै:-श्वेत; ह्यै:-घोड़ो से; युक्ते:-युक्त; महति:-विशाल; स्यन्दने:-रथ में; स्थितौ:-आशीन; माधवः-कृष्ण (लक्ष्मीपति) ने;पाण्डवः-पाण्डुपुत्र अर्जुन ने; च:-तथा; एव :- निस्चय ही; दिव्यौ:- दिव्य; शँखो:- शंख; प्रदध्मतुः बजाये। 

  दूसरी ओर से श्वेत घोड़ो द्वारा खींचे जाने वाले विशाल रथ पर आसीन कृष्ण तथा अर्जुन ने अपने -अपने दिव्य शंख बजाये। 

अर्थात:-भीष्मदेव द्वारा बजाये गये शंख की तुलना में कृष्ण तथा अर्जुन के शंखों को दिव्य कहा गया है। दिव्य शंखो की नाद से यह सूचित हो रहा था कि दूसरे पक्ष की विजय की कोई आशा नहीं थी क्योंकि कृष्ण पांडवों के पक्ष में थे। जयस्तु पाण्डुपुत्राणां येषां पक्षे जनार्दनः -जय सदा पाण्डु के पुत्र जैसों की होती है क्योंकि भगवान् कृष्ण उनके साथ  हैं। और जहाँ -जहाँ  भगवान् विद्यमान हैं,वहीँ -वहीँ लक्ष्मी भी विद्यमान रहती है क्यों कि वे अपने पति के विना नहीं रह सकती। अतः जैसा की विष्णु या भगवान् कृष्ण के शंख द्वारा उत्पन्न दिव्य ध्वनि से सूचित हो रहा था ,विजय तथा श्री दोनों ही अर्जुंन की प्रतीक्षा कर रही थीं। इसके अतिरिक्त,जिस रथ में दोनों मित्र आसीन थे वह अर्जुन को अग्नि देवता द्वारा प्रदत्त था और इससे सूचित हो रहा था कि तीनो लोकों में जहाँ कहीं भी यह जायेगा ,वहां विजय निश्चित है। 

क्रमशः !!!!

गुरुवार, 7 जनवरी 2021

BHAGVAD GITA

 ततः शंखश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः। 

सहसेवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोभवत।।१३।।  

ततः-तत्पश्चात; शंखा:-शंख; च:- भी; भेर्य:-बड़े-बड़े ढोल,नगाड़े; च:

तथा;पणव-आनक:-ढोल तथा मृदंग; गो-मुखा:-शृंग; सहसा-अचानक;एव-निश्चय ही; अभ्यहन्यन्त:-एक साथ बजाए गए; सः-वह; शब्दः-समवेत,स्वर; तुमुल:-कोलाहलपूर्ण; अभवत -हो गया।

अर्थात :-तत्पश्चात शंख, नगाड़े,बिगुल,तुरही तथा रण सींग सहसा एक साथ बज उठे। तब अत्यंत कोलाहल के साथ सभी योद्धाओं ने अपने-अपने शंख बजाये। 


बुधवार, 6 जनवरी 2021

BHAGVAD GITA

 तस्य सञ्जनयन्हर्ष कुरुवृद्धः पितामहः। 

सिंहनादं विनधोच्चे:शंखं दध्मौ प्रतापवान।।१२।।

 तस्य:-उसका; सञ्जनयन:-बढ़ाते हुए; हर्षं:-हर्ष; कुरुवृद्ध:-कुरुवंश के वयोवृद्ध;पितामहः-पितामह; सिंह -नादम:-सिंह की सी गर्जना; विनध:-गरज कर; उच्चेः-उच्च स्वर से;शंखं:-शंख; दध्मौ:-बजाया; प्रतापवान:-बलशाली। 

तब कुरुवंश के वयोवृद्ध परम प्रतापी एवं वृद्ध पितामह ने सिंह -गर्जना की सी ध्वनि करने वाले अपने शंख को उच्च स्वर से बजाया,जिससे दुर्योधन को हर्ष हुआ। 

अर्थात:- कुरुवंश के वयोवृद्ध पितामह अपने पौत्र दुर्योधन का मनोभाव जान गये और उसके प्रति अपनी स्वाभाविक दयावश उन्होंने उसे प्रसन्न करने के लिए अत्यंत उच्च स्वर से अपना शंख बजाया,जो उनकी सिंह के समान स्थिति के अनुरूप था। अप्रत्यक्ष रूप में शंख के द्वारा प्रतीकात्मक ढंग से उन्होंने अपने हताश पौत्र दुर्योधन को बता दिया कि उन्हें युद्ध में विजय की आशा नहीं है क्योंकि दूसरे पक्ष में साक्षात भगवान् श्रीकृष्ण हैं। फिर भी युद्ध का मार्गदर्शन करना उनका कर्तब्य था और इस सम्बन्ध में  कसर नहीं रखेंगे। 

क्रमशः !!!!

मंगलवार, 5 जनवरी 2021

BHAGVAD GITA

अध्याय १ श्लोक ११  

अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः। 

भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि।।११।।

अयनेषु:-मोर्चों में; च:-भी; सर्वेषु:-सर्वत्र; यथा -भागम:-अपने-अपने स्थानों पर; अवस्थिताः-स्थित; भीष्मम:-भीष्मपितामह की; एव:-निश्चय ही। 

अतएव  सैन्यव्यूह  में अपने-अपने मोर्चों पर खड़े रहकर आप सभी भीष्मपितामह को पूरी-पूरी सहायता दें। 

अर्थात:- भीष्मपितामह के शौर्य की प्रशंसा करने के बाद दुर्योधन ने सोचा कि कहीं अन्य योद्धा यह न समझ लें कि उन्हें कम महत्त्व दिया जा रहा है

अतः दुर्योधन ने अपने सहज कूटनीतिक ढंग से स्थिति सँभालने के उद्देश्य से उपर्युक्त शब्द कहे। 

उसने बलपूर्बक कहा कि भीष्मदेव निस्सन्देह महानतम योद्धा हैं, किन्तु अब वे वृद्ध हो चुके हैं,अतः प्रत्येक सैनिक को चाहिए कि चारों ओर से उनकी सुरक्षा का विशेष ध्यान रखें। हो सकता है कि वे किसी एक दिशा में युद्ध करने में लग जायँ और शत्रु इस व्यस्तता का लाभ उठा ले। अतः यह आवश्यक है कि अन्य योद्धा मोर्चों पर अपनी -अपनी स्थिति पर अडिग रहें और शत्रु को व्यूह न तोड़ने दें। 

दुर्योधन को पूर्ण विश्वास था कि कुरुओं की विजय भीष्मदेव की उपस्थिति पर निर्भर है। उसे युद्ध में भीष्मदेव तथा द्रोणाचर्य के पूर्ण सहयोग की आशा थी क्योंकि वह अच्छी तरह जानता था कि इन दोनों ने उस समय एक शब्द भी नहीं कहा था,जब द्रौपदी को असहाय अवस्था में भरी सभा में नग्न किया जा रहा था और जब उसने उनसे न्याय की भीख मांगी थी। यह जानते हुए भी कि इन दोनों सेनापतियों के मन में पांडवों के लिए स्नेह था ,दुर्योधन को आशा थी कि वे इस स्नेह को उसी तरह त्याग देंगें, जिस तरह उन्होंने धूत-क्रीड़ा के अवसर पर किया था। 

क्रमशः !!!! 


सोमवार, 4 जनवरी 2021

BHAGVAD GITA

अध्याय १ श्लोक १०  

अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम। 

पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम।। 

अपर्याप्तं:-अपरिमेय; तत:-वह; अस्माकम:-हमारी; बलं:-शक्ति; भीष्म:- भीष्मपितामह द्वारा; अभिरक्षितम:- भलीभांति संरक्षित; पर्याप्तं:-सीमित; तू :-लेकिन; इदं:-यह सब; एतेषां:-पांडवों की; बलं:-शक्ति; भीम:-भीम द्वारा; अभिरक्षितम:- सुरक्षित है। 

हमारी शक्ति अपरिमेय है और हम सब पितामह द्वारा भलीभांति संरक्षित है, जबकि पांडवों की शक्ति भीम द्वारा भलीभांति संरक्षित होकर भी सीमित है। 
अर्थात:-यहाँ पर दुर्योधन ने तुलनात्मक शक्ति का अनुमान प्रस्तुत किया है। वह सोचता है कि अत्यंत अनुभवी सेनानायक भीष्मपितामह द्वारा विशेष रूप से संरक्षित होने के कारण उसकी सशस्त्र सेनाओ की शक्ति अपरिमेय है। दूसरी ओर पांडवों की सेनाएँ सीमित हैं क्योंकि उनकी सुरक्षा एक कम अनुभवी नायक भीम द्वारा की जा रही है जो भीष्म की तुलना में नगण्य है। दुर्योधन सदैव भीम से ईर्ष्या करता था क्योंकि वह जनता था कि यदि उसकी मृत्यु कभी हुई भी तो वह भीम के द्वारा ही होगी। किन्तु साथ ही उसे दृढ़ विश्वास था कि भीष्म की उपस्थिति में उसकी विजय निश्चित है क्योंकि भीष्म कहीं अधिक उत्कृष्ट सेनापति है। वह युद्ध में विजयी होगा,यह उसका दृढ़ निश्चय था। 

क्रमशः !!!!!


रविवार, 3 जनवरी 2021

BHAGVAD GITA

 अध्याय १ श्लोक ९ 

अन्ये च बहवः श्रुरा मदर्थे त्यक्तजीविताः। 
नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः।।९।। 

अन्ये:-अन्य सब; च:-भी;बहवः-अनेक; श्रुरा:-बीर; मदर्थे:-मेरे लिए;त्यक्तजीविताः-जीवन का उत्सर्ग करने वाले; नाना:-अनेक; शस्त्र:-आयुध;परहरणाः-से युक्त,सुसज्जित; सर्वे-सभी; युद्ध-विशारदाः-युद्ध विद्या में निपुण। 

दुर्योधन कहते हैं,ऐसे अनेक अन्य वीर भी है,जो मेरे लिए अपना जीवन त्याग करने के लिए उद्यत हैं। वे विविध प्रकार के हथियारों से सुसज्जित हैं और युद्धविद्या में निपुण हैं।

अर्थात:- अन्य वीर जैसे जयद्रथ,कृतवर्मा,तथा शल्य का सम्बन्ध है ,वे  दुर्योधन के लिए अपने प्राणों की आहुति देने के लिए तैयार रहते थे। अर्थात यह पूर्वनिश्चित है कि वे अब पापी दुर्योधन के दल में सम्मिलित होने के कारण कुरुक्षेत्र के युद्ध में मारे जायेंगे। निस्संदेह अपने मित्रों की संयुक्त-शक्ति के कारण दुर्योधन अपनी विजय के प्रति आश्वस्त था। 

क्रमशः !!!!!

 

शनिवार, 2 जनवरी 2021

BHAGVAD GITA

 अध्याय १ श्लोक ७&८ 

अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम। 

नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थ तांब्रवीमि ते।।७।।

अस्माकं:-हमारे; तु:-लेकिन; विशिष्टा:-विशेष शक्तिशाली; ये:-जो;

तान:-उनको; निबोध:-जरा जान लीजिये; द्विजोत्तम:-हे ब्राह्मणश्रेष्ठ;

नायकाः-सेनापति; मम:-मेरी; सैन्यस्य:-सेना के; संज्ञार्थ:-सूचना के लिए 

तान:-उन्हें; ब्रवीमि:-बता रहा हूँ; ते:-आपको। 

अर्थात :-किन्तु हे ब्राह्मणश्रेठ !आपकी सूचना  लिए मैं अपनी सेना के उन नायकों के विषय में बताना चाहूंगा,जो मेरी सेना को संचालित करने में विशेष रूप से निपुण हैं। 

भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिंजयः। 

अश्वत्त्थामा विकर्णश्च सोमदत्तिस्तथैव च।।८।।

भवान:-आप; भीष्मः-भीष्मपितामह;च:-भी; कर्ण:-कर्ण; च:-और;

कृप:-कृपाचार्य; समितिञ्जयः -सदा संग्रामविजयी; अश्वत्त्थामा:-अश्वत्त्थामा; विकर्ण: -विकर्ण; च:-तथा; सोमदतीः-सोमदत्त का पुत्र; 

तथा:-भी; एव:-निश्चय ही; च:- भी। 

अर्थात :- मेरी सेना में स्वयं आप भीष्म, कर्ण, कृपाचार्य, अश्वत्थामा, विकर्ण तथा सोमदत्त का पुत्र भूरिश्रवा आदि हैं,जो युद्ध में सदैव विजयी रहे हैं। 

दुर्योधन उन अद्वित्तीय युद्धवीरों का उल्लेख करता है   जो सदैव विजयी होते रहे है। विकर्ण दुर्योधन का भाई है, अश्वत्थामा द्रोणाचार्य का पुत्र है। कर्ण अर्जुन का आधा भाई है,क्योंकि वह कुंती के गर्भ से राजा पाण्डु से विवाहित होने से पूर्व उत्पन्न हुआ है। कृपाचार्य  की जुड़वां बहन के साथ द्रोणाचार्य जी ने शादी की थी। 

क्रमशः !!!!!!!!

शुक्रवार, 1 जनवरी 2021

BHAGVAD GITA

 अध्याय १ श्लोक ६ 

युधामनुश्च विक्रांत उत्तमौजाश्च वीर्यवान। 

सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः।।६।।

युधामन्युः -युधामन्यु; च:-तथा; विक्रांत:-पराक्रमी; उत्तमौजा:-उत्तमौजा;

च:-तथा;वीर्यवान:-अत्यंत शक्तिशाली; सौभद्र:-सुभद्रा का पुत्र; 

द्रोपदेयाः-द्रोपदी के पुत्र; च:-तथा; सर्वे:-सभी; एव-निस्चय ही; 

महारथाः -महारथी। 

अर्थात:-इस प्रकार से दुर्योधन,द्रोणाचार्य जी से कह रहे थे कि पांडवो की सेना में पराक्रमी युधामन्यु, अत्यंत शक्तिशाली उत्तमौजा,सुभद्रा का पुत्र तथा द्रोपदी के पुत्र -ये सभी महारथी हैं। 

क्रमशः- !!!!!