शुक्रवार, 30 अप्रैल 2021

BHAGAVAD GITA 3:7

 🙏🙏

यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेर्जुनः। 

कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते।।७।।

यः-जो; तु -लेकिन; इन्द्रियाणि -इन्द्रियों को; मनसा-मन के द्वारा; नियम्य -वश में करके; आरभते -प्रारम्भ करता है; अर्जुन -हे अर्जुन; कर्म-इन्द्रियैः -कर्मेन्द्रियों से; कर्म-योगम -भक्ति; असक्त -अनासक्त; सः-वह; विशिष्यते -श्रेष्ठ है। 

दूसरी ओर यदि कोई निष्ठावान व्यक्ति अपने मन के द्वारा कर्मेन्द्रियों को वश में करने का प्रयत्न करता है और विना किसी आसक्ति के कर्मयोग (कृष्णभावनामृत में ) प्रारम्भ करता है,तो वह अति उत्कृष्ट है। 

तात्पर्य :-लम्पट जीवन और इन्द्रियसुख के लिए छद्म योगी का मिथ्या वेश धारण करने की अपेक्षा अपने कर्म में लगे रहकर जीवन लक्ष्य को,जो भवबन्धन से मुक्त होकर भगवद्धाम को जाना है,प्राप्त करने के लिए कर्म करते रहना अधिक श्रेयस्कर है। प्रमुख स्वार्थ -गति तो विष्णु के पास जाना है। सम्पूर्ण वर्णाश्रम -धर्म का उद्देश्य इसी जीवन का लक्ष्य की प्राप्ति है। एक गृहस्थ भी कृष्णभावनामृत में नियमित सेवा करके इस  लक्ष्य तक पहुंच सकता है। आत्म-साक्षात्कार के लिए मनुष्य शास्त्रानुमोदित संयमित जीवन बिता सकता है और अनासक्त भाव से अपना कार्य करता रह सकता है। इस प्रकार वह प्रगति कर सकता है। जो निष्ठावान व्यक्ति इस विधि का पालन करता है वह उस पाखंडी धूर्त से कहीं श्रेष्ठ है जो अबोध जनता को ठगने के लिए दिखावटी आध्यात्मिकता का जामा धारण करता है। जीविका के लये ध्यान धरने वाले प्रवंचक ध्यानी की अपेक्षा सड़क पर झाडू लगाने वाला निष्ठावान व्यक्ति कहीं अच्छा है।🙏🙏

क्रमशः !!!   

गुरुवार, 29 अप्रैल 2021

BHAGAVAD GITA 3:6

 🙏🙏

कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन। 

इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते।।६।।

कर्म-इन्द्रियाणि-पांचों कर्मेन्द्रियों को; संयम्य-वश करके; यः -जो; आस्ते -रहता है; मनसा -मन से; स्मरन - सोचता हुआ; इन्द्रिय -अर्थान -इन्द्रियविषयों को; विमूढ़ -मूर्ख; आत्मा -जीव;मिथ्या -आचारः -दम्भी;  सः-वह; उच्यते-कहलाता है। 

जो कर्मेन्द्रियों को वश में तो करता है,किन्तु जिसका मन इन्द्रियविषयों का चिन्तन करता रहता है,वह निश्चित रूप से स्वयं को धोखा देता है और मिथ्याचारी कहलाता है। 

तात्पर्य :-ऐसे अनेक मिथ्याचारी व्यक्ति होते हैं,जो कृष्णभावनामृत में कार्य तो नहीं करते,किन्तु ध्यान का दिखावा करते हैं,जबकि वास्तव में वे मन में इन्द्रियभोग का चिन्तन करते रहते हैं। ऐसे लोग अपने अबोध शिष्यों को बहकाने के लिए शुष्क दर्शन के विषय में भी व्याख्यान दे सकते हैं, किन्तु इस श्लोक के अनुसार वे सबसे बड़े धूर्त हैं। इन्द्रियसुख के लिए किसी भी आश्रम में रहकर कर्म किया जा सकता है,किन्तु यदि उस विशिष्ट पद का उपयोग विधिविधानों के पालन में किया जाय तो व्यक्ति की क्रमशः आत्मशुद्धि हो सकती है। किन्तु जो अपने को योगी बताते हुए इन्द्रियतृप्ति के विषयों की खोज में लगा रहता है,वह सबसे बड़ा धूर्त है, भले ही वह कभी -कभी दर्शन का उपदेश क्यों न दे। उसका ज्ञान व्यर्थ है क्योंकि ऐसे पापी पुरुष के ज्ञान के सारे फल भगवान् की माया द्वारा हर लिए जाते हैं। ऐसे धूर्त का चित्त सदैव अशुद्ध रहता है,अतएव उसके योगिक ध्यान का कोई अर्थ नहीं होता। 

क्रमशः !!!🙏🙏     

बुधवार, 28 अप्रैल 2021

BHAGAVAD GITA 3:5

🙏🙏

न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत। 

कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः।।५।।

न -नहीं; हि-निश्चय ही; कश्चित्-कोई; क्षणम -क्षणमात्र; अपि-भी; जातु -किसी काल में; तिष्ठति-रहता है; अकर्म-कृत-बिना कुछ किये; कार्यते -करने के लिए बाध्य होता है; हि -निश्चय ही; अवशः-विवश होकर;कर्म -कर्म; सर्वः-समस्त; प्रकृति -जैः -प्रकृति के गुणों से उत्पन्न; गुणैः -गुणों के द्वारा। 

प्रत्येक व्यक्ति को प्रकृति से अर्जित गुणों के अनुसार विवश होकर कर्म करना पड़ता है,अतः कोई भी एक क्षणभर के लिए भी बिना कर्म किये नहीं रह सकता। 

तात्पर्य :-यह देहधारी जीवन का प्रश्न नहीं है, अपितु आत्मा का यह स्वभाव है कि वह सदैव सक्रिय रहता है। आत्मा की अनुपस्थिति में भौतिक शरीर हिल भी नहीं सकता। यह शरीर मृत वाहन के समान है,जो आत्मा द्वारा चलित होता है क्योंकि आत्मा सदैव गतिशील (सक्रिय )रहता है और वह एक क्षण के लिए भी नहीं रूक सकता। अतः आत्मा को कृष्णभावनामृत के सत्कर्म में प्रवृत रखना चाहिए अन्यथा वह माया द्वारा शासित कार्यों में प्रवृत होता रहेगा। माया के संसर्ग में आकर आत्मा भौतिक गुण प्राप्त कर लेता है और आत्मा को ऐसे आकर्षणों से शुद्ध करने के लिए यह आवश्यक है कि शास्त्रों द्वारा आदिष्ट कर्मों में इसे संलग्न रखा जाय। किन्तु यदि आत्मा कृष्णभावनामृत के अपने स्वाभाविक कर्म में निरत रहता है,तो वह जो भी करता है उसके लिए कल्याणप्रद होता है। श्रीमद्भागवत (१.५. १७ ) द्वारा इसकी पुष्टि हुई है -

त्यक्त्वा स्वधर्म चरणाम्बुजं हरेर्भजन्नपवकोथ  पतेततो यदि। 

यत्र क्व वाभद्रंभूदमुष्य  किं  को वार्थ आप्तोभजतां स्वधर्मतः।। 

"यदि कोई कृष्णभावनामृत अंगीकार कर लेता है तो भले ही वह शास्त्रानुमोदित कर्मों को न करे अथवा ठीक से भक्ति न करे चाहे वह पतित भी हो जाय तो इसमें उसकी हानि या बुराई नहीं होगी। किन्तु यदि वह शास्त्रानुमोदित सारे कार्य करे और कृष्णभावनाभावित न हो तो ये सारे कार्य किस लाभ के हैं ?"

अतः कृष्णभावनामृत के इस स्तर तक पहुँचने के लिए शुद्धिकरण की प्रक्रिया आवश्यक है। अतएव  संन्यास या कोई भी शुद्धिकारी पद्धति कृष्णभावनामृत के चरम लक्ष्य तक पहुँचने में सहायता देने के लिए है,क्योंकि उसके बिना सब कुछ व्यर्थ है। 

क्रमशः!!!🙏🙏 

मंगलवार, 27 अप्रैल 2021

BHAGAVAD GITA 3:4

 🙏🙏

न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्य पुरुषोश्रुते। 

न च संन्यसनादेव सिद्धिं समगच्छति।।४।।

न -नहीं; कर्मणाम -नियत कर्मों के;अनारम्भात-न करने से; नैष्कर्म्यम - कर्म बन्धन से मुक्ति को; पुरुषः -मनुष्य ; अश्रुते -प्राप्त करता है;न -नहीं; च -भी; सन्न्यसनात - त्याग से; एव -केवल; सिद्धिम -सफलता; समधिगच्छति -प्राप्त करता है। 

न तो कर्म से विमुख होकर कोई कर्मफल से छुटकारा पा सकता है और न केवल संन्यास से सिद्धि प्राप्त की जा सकती है। 

तात्पर्य :-  भौतिकतावादी मनुष्यों के हृदयों को विमल करने के लिए जिन कर्मों का विधान किया गया है उनके द्वारा शुद्ध हुआ मनुष्य ही संन्यास ग्रहण कर सकता है। शुद्धि के बिना अनायास संन्यास ग्रहण करने से सफलता नहीं मिल पाती।  ज्ञानयोगियों के अनुसार संन्यास ग्रहण करने अथवा सकाम कर्म से विरत होने से ही मनुष्य नारायण के समान हो जाता है। किन्तु भगवान कृष्ण इस मत का अनुमोदन नहीं करते। ह्रदय की शुद्धि के बिना संन्यास सामाजिक व्यवस्था में उत्पात उत्पन्न करता है। दूसरी ओर यदि कोई नियत कर्मों को न करके भी भगवान की दिव्य सेवा करता है तो वह उस मार्ग में जो कुछ भी उन्नति करता है उसे भगवान स्वीकार कर लेते हैं (बुद्धियोग)। स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात। ऐसे सिद्धान्त की रंचमात्र सम्पन्नता भी महान कठिनाइयों को पार करने में सहायक होती है।🙏🙏

क्रमशः !!! 

                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                     

सोमवार, 26 अप्रैल 2021

BHAGAVAD GITA 3:3

 🙏🙏

श्रीभगवानुवाच 

लोकेस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ। 

ज्ञानयोगें संख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम।।३।।

श्री -भगवान् उवाच -श्रीभगवान ने कहा; लोके -संसार में; अस्मिन -इस; द्वि -विधा -दो प्रकार की; निष्ठा -श्रद्धा; पुरा -पहले; प्रोक्ता -कही गयी; मया -मेरे द्वारा; अनघ -हे निष्पाप; ज्ञान-योगेन -भक्तियोग के द्वारा; योगिनाम -भक्तों का। 

श्री भगवान् ने कहा -हे निष्पाप अर्जुन ! मैं पहले ही बता चूका हूँ कि आत्म -साक्षात्कार प्रयत्न करने वाले दो प्रकार के पुरुष होते हैं। कुछ इसे ज्ञानयोग द्वारा समझने का प्रयत्न करते हैं,तो कुछ भक्ति -मय सेवा द्वारा। 

तात्पर्य :-द्वितीय अध्याय के उन्तालीसवें श्लोक में भगवान् ने दो प्रकार की पद्धतियों का उल्लेख किया है -सांख्ययोग तथा कर्मयोग या बुद्धियोग। इस श्लोक में इनकी और अधिक स्पष्ट विवेचना की गयी है। सांख्ययोग अथवा आत्मा तथा पदार्थ की प्रकृति का वैश्लेषिक अध्ययन उन लोगों के लिए है,जो व्यावहारिक ज्ञान तथा दर्शन द्वारा वस्तुओं का चिंतन एवं मनन करना चाहते हैं। दूसरे प्रकार के लोग कृष्णभावनामृत में कार्य करते हैं जैसा के द्वितीय अध्याय के इकसठवें श्लोक में बताया गया है। उन्तालीसवें श्लोक में भी भगवान् ने बताया है कि बुद्धियोग या कृष्णभावनामृत के सिद्धांतों पर चलते हुए मनुष्य कर्म के बंधनों से छूट सकता है तथा इस पद्धति में कोई में कोई दोष नहीं है। इकसठवें श्लोक में इसी सिद्धांत को और अधिक स्पष्ट किया गया है -कि बुद्धियोग पूर्णतया परब्रह्म (विशेषतया कृष्ण ) पर आश्रित है और इस प्रकार  समस्त इन्द्रियों को सरलता से वश में किया  है। अतः दोनों प्रकार के योग धर्म तथा दर्शन के रूप में अन्योन्याश्रित हैं। दर्शनविहीन धर्म मात्र भावुकता या कभी -कभी धर्मान्धता है और धर्मविहीन दर्शन मानसिक उहापोह है। अंतिम लक्ष्य तो श्रीकृष्ण हैं क्योंकि जो दार्शनिकजन परम सत्य की खोज करते रहते हैं,वे अंततः कृष्णभावनामृत  को प्राप्त होते हैं। इसका भी उल्लेख भगवदगीता में मिलता है। सम्पूर्ण पद्धति का उद्देश्य परमात्मा के सम्बन्ध में अपनी वास्तविक स्थिति को समझ लेना है। इसकी अप्रत्यक्ष पद्धति दार्शनिक चिंतन है,जिसके द्वारा क्रम से कृष्णभावनामृत तक पहुंचा जा सकता है। प्रत्यक्ष पद्धति में कृष्णभावनामृत में ही प्रत्येक वस्तु से अपना सम्बन्ध जोड़ना होता है। इन दोनों में से कृष्णभावनामृत का मार्ग श्रेष्ठ है क्योंकि इसमें दार्शनिक पद्धति द्वारा इन्द्रियों को विमल नहीं करना होता। कृष्णभावनामृत स्वयं ही शुद्ध करने वाली प्रक्रिया है और भक्ति की प्रत्यक्ष विधि सरल तथा दिव्य होती है। 

क्रमशः !!!🙏🙏  


रविवार, 25 अप्रैल 2021

BHAGAVAD GITA 3:2

 🙏🙏

व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव में। 

तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोहमाप्नुयाम।।२।।  

व्यामिश्रेण -अनेकार्थक; इव -मानो; वाक्येन - शब्दों में; बुद्धिम-बुद्धि; मोहयसि -मोह रहे हो; इव -मानो; में -मेरी; ततः-अतः; एकम -एकमात्र; वद-कहिये; निश्चित्य -निश्चय करके; येन -जिससे; श्रेयः -वास्तविक लाभ; अहम् -मैं; आप्नुयाम -पा सकूँ। 

आपके व्यामिश्रित (अनेकार्थक ) उपदेशों से मेरी बुद्धि मोहित हो गयी है। अतः कृपा करके निश्चयपूर्वक मुझे बताएं कि इनमे से मेरे लिए सर्वाधिक श्रेयकर क्या होगा ?

तात्पर्य :-पिछले अध्याय में,भगवदगीता के उपक्रम के रूप सांख्ययोग,बुद्धियोग,बुद्धि द्वारा इन्द्रियनिग्रह,निष्काम कर्मयोग तथा नवदीक्षित की स्थिति जैसे विभिन्न मार्गों का वर्णन किया गया है। किन्तु उसमे तारतम्य नहीं था। कर्म करने तथा समझने के लिए मार्ग की अधिक व्यवस्थित रूपरेखा की आवश्यकता होगी। अतः अर्जुन इन भ्रामक विषयों को स्पष्ट कर लेना चाहता था, जिससे सामान्य मनुष्य बिना किसी भ्रम के उन्हें स्वीकार कर सके। यद्द्पि श्रीकृष्ण वाक्चातुरी से अर्जुन को चकराना नहीं चाहते थे,किन्तु अर्जुन यह नहीं समझ सका कि कृष्णभावनामृत क्या है -जड़ता है या सक्रिय सेवा। दूसरे शब्दों में,अपने प्रश्नों से वह उन समस्त शिष्यों  के लिए जो भगवदगीता के रहस्य को समझना चाहते हैं,कृष्णभावनामृत का मार्ग प्रशस्त कर रहा है। 

क्रमशः !!!🙏🙏 

शनिवार, 24 अप्रैल 2021

BHAGAVAD GITA 3:1

 अध्याय -३ 

कर्मयोग 

अर्जुन उवाच 

🙏🙏

ज्यायसी चेतकर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन। 

तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव।।१।।

अर्जुनः उवाच -अर्जुन ने कहा; ज्यायसी -श्रेष्ठ; चेत-यदि कर्मणः -सकाम कर्म की अपेक्षा; ते-तुम्हारे द्वारा; मता-मानी जाती है;बुद्धिः-बुद्धि; जनार्दन -हे कृष्ण;तत -अतः; किम -क्यों,फिर; कर्मणि -कर्म में; घोरे-भयंकर,हिंसात्मक; माम -मुझको;नियोजयसि -नियुक्त करते हो;  केशव -हे कृष्ण। 

अर्जुन ने कहा - जनार्दन,हे केशव ! यदि आप बुद्धि को सकाम कर्म से श्रेष्ठ समझते हैं तो फिर आप मुझे इस घोर युद्ध में क्यों लगाना चाहते हैं  ?

तात्पर्य :-श्री भगवान् कृष्ण ने पिछले अध्याय में अपने घनिष्ठ मित्र अर्जुन को संसार के शोक -सागर से उबारने के उद्देश्य से आत्मा  के स्वरूप का विशद वर्णन किया है और आत्म -साक्षात्कार के जिस मार्ग की संस्तुति की है  वह है-बुद्धियोग या कृष्णभावनामृत। कभी -कभी कृष्णभावनामृत को भूल से जड़ता समझ लिया जाता है और ऐसी भ्रांत धारणा वाला मनुष्य भगवान् कृष्ण नाम जप द्वारा पूर्णतया कृष्णभावनाभावित होने के लिए प्रायः एकान्त स्थान में चला जाता है। किन्तु कृष्णभावनामृत -दर्शन में प्रशिक्षित हुए बिना एकान्त स्थान में कृष्ण नाम जप करना ठीक नहीं। इससे अबोध जनता से केवल सस्ती प्रशंसा प्राप्त हो सकेगी। अर्जुन को भी कृष्णभावनामृत या बुद्धियोग ऐसा लगा मानो वह सक्रिय जीवन से सन्यास लेकर एकांत स्थान में तपस्या का अभ्यास हो। दूसरे शब्दों में,वह कृष्णभावनामृत को बहाना बनाकर चातुरीपूर्वक युद्ध से जी छुड़ाना चाहता था। किन्तु एकनिष्ठ शिष्य होने के नाते उसने यह बात अपने गुरु के समक्ष रखी और कृष्ण से सर्वोत्तम कार्य -विधि के विषय में प्रश्न किया। उत्तर में भगवान् ने तृतीय अध्याय में कर्मयोग अर्थात कृष्णभावनाभावित कर्म की विस्तृत व्याख्या की।

क्रमशः- !!!🙏🙏        

गुरुवार, 22 अप्रैल 2021

BHAGAVAD GITA 2:72

🙏🙏 

ऐषा ब्राह्मी स्थिति:पार्थ विमुह्यति। 

स्थित्वास्यामन्तकालेपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति।।७२।।

ऐषा -यह; ब्राह्मी -आद्यात्मिक; स्थितिः -स्थिति; पार्थ -हे पृथापुत्र; न -कभी नहीं; एनाम -इसको; प्रायः-प्राप्त करके;विमुह्यति-मोहित होता है; स्थित्वा-स्थित होकर;अस्याम -इसमें; अन्तकाले-जीवन के अंतिम समय में;अपि -भी; ब्रह्म-निर्वाणम-भगवद्धाम को; ऋच्छति-प्राप्त होता है। 

यह आध्यत्मिक तथा ईश्वरीय जीवन का पथ है,जिसे प्राप्त करके मनुष्य मोहित नहीं होता। यदि कोई जीवन के अंतिम समय में भी इस तरह स्थित हो,तो वह भगवद्धाम में प्रवेश कर सकता है। 

तात्पर्य :-मनुष्य कृष्णभावनामृत या दिव्य जीवन को एक क्षण में प्राप्त कर सकता है और हो सकता है कि उसे लाखों जन्मो  के बाद भी न प्राप्त हो। यह तो सत्य को समझने और स्वीकार करने की बात है। खटवांग महाराज ने अपनी मृत्यु के कुछ मिनट पूर्व कृष्ण  शरणागत होकर ऐसी जीवन अवस्था प्राप्त कर ली। निर्वाण अर्थ है -भौतिकवादी  शैली का अंत। बौद्ध दर्शन के अनुसार इस भौतिक जीवन के पूरा होने पर केवल शून्य शेष रहता है,किन्तु भगवदगीता की शिक्षा इसमें भिन्न है। वास्तविक जीवन का शुभारम्भ इस भौतिक जीवन के पूरा होने पर होता है। स्थूल  भौतिकवादी के लिए यह जानना पर्याप्त होगा कि इस भौतिक जीवन का अन्त निश्चित है,किन्तु आध्यात्मिक दृष्टि से उन्नत व्यक्तियों के लिए इस जीवन के बाद अन्य जीवन प्रारम्भ  होता है।  इस जीवन का अन्त होने से पूर्व यदि कोई कृष्णभावनाभावित हो जाय तो उसे तुरन्त ब्रह्म -निर्वाण अवस्था प्राप्त हो जाती है। भगवद्धाम तथा भगवद्भक्ति के बीच कोई अन्तर नहीं है। चूँकि दोनों परम पद हैं, अतः भगवान् की दिव्य प्रेमाभक्ति में व्यस्त रहने का अर्थ है -भगवद्धाम को प्राप्त करना। भौतिक जगत में इन्द्रियतृप्ति विषयक कार्य  होते हैं और आध्यत्मिक जगत में कृष्णभावनामृत विषयक। इसी जीवन में ही कृष्णभावनामृत की प्राप्ति तत्काल ब्रह्मप्राप्ति जैसी है और जो कृष्णभावनामृत में स्थित होता है,वह निश्चित रूप से पहले ही भगवद्धाम में प्रवेश कर चुका होता है। 

ब्रह्म और भौतिक पदार्थ एक दूसरे से सर्वथा विपरीत हैं। अतः ब्राह्मी -स्थिति का अर्थ है , "भौतिक कार्यों के पद पर होना" भगवदगीता में भगवद्भक्ति को मुक्त अवस्था माना गया है (स गुणान्समतीत्यैतान ब्रह्मभूयाय कल्पते ) अतः ब्राह्मी -स्थिति भौतिक स्थिति से मुक्ति है। 

श्रील भक्ति विनोद ठाकुर ने भगवदगीता के इस द्वितीय अध्याय को सम्पूर्ण ग्रन्थ के प्रतिपाद्द विषय रूप में संक्षिप्त किया है। भगवदगीता के प्रतिपाद्द हैं -कर्मयोग,ज्ञानयोग,तथा भक्तियोग। इस द्वितीय अध्याय में कर्मयोग तथा ज्ञानयोग की स्पष्ट व्याख्या  हुई है एवं भक्तियोग की भी झाँकी दे दी गई है।

इस प्रकार श्रीमदभगवदगीता के द्वितीय अध्याय  "गीता का सार " का भक्तिवेदांत तात्पर्य पूर्ण हुआ।  

क्रमशः !!!🙏🙏    

बुधवार, 21 अप्रैल 2021

BHAGAVAD GITA 2:71

🙏🙏

विहाय कामान्य:सर्वान्पुमांश्चरति निः स्पृहः। 

निर्ममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति।।७१।।

विहाय -छोड़कर;कामान -इन्द्रियतृप्ति की भौतिक इच्छाएं; यः - जो; सर्वान -समस्त; पुमान -पुरुष; चरति-रहता है; निः स्पृहः -इच्छारहित; निर्मममः ममतारहित; निरहङ्कार -अहंकारशून्य;सः -वह; शान्तिम -पूर्ण शांति को; अधिगच्छति -प्राप्त होता है। 

जिस व्यक्ति ने  इन्द्रियतृप्ति की  समस्त इच्छाओं का परित्याग  दिया है, जो इच्छाओं से रहित  रहता है और जिसने सारी ममता त्याग दी है तथा अहंकार से रहित है, वही वास्तविक शांति को  प्राप्त कर सकता है। 

तात्पर्य :-निस्पृह होने का अर्थ है -इन्द्रियतृप्ति के लिए कुछ भी इच्छा न करना। दूसरे शब्दों में,कृष्णभावनाभावित होने की इच्छा वास्तव में इच्छाशून्यता या निस्पृहता है। इस शरीर को मिथ्या ही आत्मा माने बिना तथा संसार की किसी वस्तु में कल्पित स्वामित्व रखे बिना श्री कृष्ण के नित्य दास के रूप में अपनी यथार्त स्थिति को जान लेना कृष्णभावनामृत की सिद्ध अवस्था है। जो इस सिद्ध अवस्था में स्थित है वह जानता है कि श्रीकृष्ण ही प्रत्येक वस्तु के स्वामी हैं ,अतः प्रत्येक वस्तु का उपयोग उनकी तुष्टि के लिए किया जाना चाहिए। अर्जुन आत्म-तुष्टि के लिए युद्ध नहीं करना चाहता था ,किन्तु जब वह पूर्ण रूप से कृष्णभावनाभावित हो गया तो उसने युद्ध किया, क्यूंकि कृष्ण चाहते थे कि वह युद्ध करे। उसे अपने लिए युद्ध करने की कोई इच्छा न थी, किन्तु वही अर्जुन कृष्ण के लिए अपनी शक्ति भर लड़ा। वास्तविक इच्छाशून्यता कृष्ण -तुष्टि के लिए इच्छा है, यह इच्छाओं को नष्ट करने का कोई कृत्रिम प्रयास नहीं है। जीव कभी भी इच्छा शून्य या इन्द्रिय शून्य नहीं हो सकता , किन्तु उसे अपनी इच्छाओं की गुणवत्ता बदलनी होती है। भौतिक दृष्टि से इच्छाशून्य व्यक्ति जानता है कि प्रत्येक वस्तु कृष्ण की है (ईशावास्यमिदं सर्वम )अतः वह किसी वस्तु पर अपना स्वामित्व घोषित नहीं करता। यह दिव्य ज्ञान आत्म-साक्षात्कार पर आधारित है-अर्थात इस ज्ञान पर कि प्रत्येक जीव कृष्ण का अंश रूप है और जीव की शाश्वत स्थिति कभी न तो कृष्ण के तुल्य होती है न उनसे बढ़कर। इस प्रकार कृष्णभावनामृत का यह ज्ञान ही वास्तविक शांति का मूल सिद्धांत है।  

क्रमशः!!!🙏🙏         

सोमवार, 19 अप्रैल 2021

BHAGAVAD GITA 2:70

 आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं 

                     समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत। 

तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे

                                 स शान्तिमाप्नोति न कामकामी।।७०।।

आपूर्यमाणम-नित्य परिपूर्ण; अचल-प्रतिष्ठं -दृढ़तापूर्वक स्थित; समुद्रम -समुद्र में; आप:-नदियाँ; प्रविशन्ति -प्रवेश करती हैं; यद्वत -जिस प्रकार; तद्वत -उसी प्रकार; कामाः-इच्छाएं; यम-जिसमें; प्रविशन्ति-प्रवेश करती है; सर्वे-सभी; सः -वह व्यक्ति; शान्तिम-शांति; आप्नोति-प्राप्त करता है; न -नहीं; काम -कामी-इच्छाओं को पूरा करने का इच्छुक। 

जो पुरुष समुद्र में निरंतर प्रवेश करती रहने वाली नदियों के समान इच्छाओं के निरंतर प्रवाह से विचलित नहीं होता और जो सदैव स्थिर रहता है, वही शांति प्राप्त कर सकता है, वह नहीं जो ऐसी इच्छाओं को तुष्ट करने की चेष्टा करता है।

तात्पर्य :-यद्दपि विशाल  सागर में सदैव जल रहता है,किन्तु वर्षा ऋतु में विशेषतया वह अधिकाधिक जल से  भरता जाता है  तो भी सागर उतने पर ही स्थिर रहता है। न तो वह विक्षुब्ध होता है और न तट की सीमा का उल्लघन  करता है। यही स्थिति कृष्णभावनाभावित व्यक्ति की है। जब तक मनुष्य शरीर है,तब तक इन्द्रियतृप्ति के लिए शरीर की मांगे बनी रहेंगी। किन्तु भक्त अपनी पूर्णता के कारण ऐसी इच्छाओं से विचलित नहीं होता। कृष्णभावनाभावित व्यक्ति को  किसी वस्तु  की आवश्यकता नहीं होती क्योंकि भगवान उसकी सारी आवश्यकताएं पूरी करते रहते हैं। अतः वह सागर के तुल्य होता है -अपने में सदैव पूर्ण। सागर में गिरने वाली नदियों के समान इच्छाएं उसके पास आ सकती हैं,किन्तु  कार्य में स्थिर  रहता है और इन्द्रियतृप्ति की इच्छा से रंचभर भी विचलित नहीं होता। कृष्णभावनाभावित व्यक्ति का यही प्रमाण है -इच्छाओं के होते हुए भी वह कभी इन्द्रियतृप्ति के लिए उन्मुख नहीं होता। चूँकि वह भगवान् की दिव्य प्रेमाभक्ति में तुष्ट रहता है,अतः वह समुद्र की भांति स्थिर रहकर पूर्ण शांति का आनंद उठा सकता है-किन्तु दूसरे लोग जो मुक्ति की सीमा तक इच्छाओं की पूर्ति करना चाहते हैं,फिर भौतिक सफलताओं का क्या कहना -उन्हें कभी शांति नहीं मिल पाती।कर्मी मुमुक्षु तथा वे योगी -सिद्धि के कामी हैं,ये सभी अपूर्ण इच्छाओं के कारण दुःखी रहते हैं। किन्तु कृष्णभावनाभावित पुरुष भगवत्सेवा में सुखी रहता है और उसकी कोई इच्छा नहीं होती। वस्तुतः वह तो तथाकथित भवबंधन से मोक्ष की भी कामना नहीं करता। कृष्ण के भक्तों की कोई भौतिक इच्छा नहीं रहती,इसलिए वे पूर्ण शांत रहते हैं। 

क्रमशः !!!         

                 

गुरुवार, 15 अप्रैल 2021

BHAGAVAD GITA 2:69

🙏🙏 

या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागृति संयमी। 

यस्यां जागृति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः।।६९।।

या -जो ; निशा -रात्रि है; सर्व -सम्मत; भूतानाम - जीवों की; तस्याम -उसमें ; जागर्ति -जागता रहता है ; संयमी -आत्मसंयमी व्यक्ति; यस्याम -जिसमें; जागृति -जागते हैं;भूतानि -सभी प्राणी; सा -वह; निशा -रात्रि; पश्यतः -आत्मनिरीक्षण करने वाले; मुनेः मुनि के लिए। 

जो सब जीवों के लिए रात्रि है,वह आत्मसंयमी के जागने का समय है और जो समस्त जीवों का जागने के समय है वह आत्मनिरीक्षक मुनि के के लिए रात्रि है। 

तात्पर्य :- बुद्धिमान मनुष्यों की दो श्रेणियां हैं। एक श्रेणी के मनुष्य इन्द्रियतृप्ति के लिए भौतिक कार्य करने में निपुण  होते हैं और दूसरी श्रेणी के मनुष्य आत्मनिरीक्षक हैं, जो आत्म-साक्षात्कार के अनुशीलन के लिए जागते हैं। विचारवान पुरुषों  आत्मनिरीक्षक मुनि के कार्य भौतिकता में लीन  पुरषों के लिए रात्रि के समान है। भौतिकवादी व्यक्ति ऐसी रात्रि में अनभिज्ञता के कारण आत्म-साक्षात्कार के प्रति  सोये रहते हैं। आत्मनिरीक्षक मुनि भौतिकवादी पुरुषों की रात्रि में जागे रहते हैं। मुनि को आध्यात्मिक अनुशीलन की क्रमिक उन्नति में दिव्य आनन्द  अनुभव  होता है,किन्तु भौतिकवादी कार्यों में लगा व्यक्ति,आत्म-साक्षात्कार के प्रति सोया रहकर अनेक प्रकार के इन्द्रियसुखों का  स्वप्न देखता है उसी सुप्तावस्था में कभी सुख तो कभी दुःख का अनुभव करता है। आत्म-निरीक्षक मनुष्य भौतिक सुख तथा दुःख के प्रति अन्यमनस्क रहता है। वह भौतिक घातों से अविचलित रहकर आत्म -साक्षात्कार के कार्यों में लगा  रहता है। 

क्रमशः :-!!! 🙏🙏  

   

मंगलवार, 13 अप्रैल 2021

BHAGAVAD GITA 2:68

🙏🙏 

तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः। 

इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।।६८।।

तस्मात् -अतः;यस्य -जिसकी; महाबाहो-हे महाबाहु ; निगृहीतानि -इस तरह वशीभूत; सर्वशः-सब प्रकार से; इन्द्रियाणि-इन्द्रियां; इन्द्रिय -अर्थेभ्य-इन्द्रियविषयों से; तस्य -उसकी; प्रज्ञा -बुद्धि; प्रतिष्ठिता -स्थिर। 

अतः हे महाबाहु ! जिस प्रकार पुरुष की इन्द्रियां अपने -अपने विषयों से सब प्रकार से वितरित होकर उसके वश में हैं,उसी की बुद्धि निस्संदेह स्थिर है। 

तात्पर्य :- कृष्णभावनामृत के द्वारा या सारी इन्द्रियों  को भगवान् की दिव्य प्रेमाभक्ति में लगाकर इन्द्रियतृप्ति की बलवती शक्तियों को दमित किया जा सकता है। जिस प्रकार शत्रुओं का दमन श्रेष्ठ सेना द्वारा किया जाता है उसी प्रकार इन्द्रियों का दमन किसी मानवीय प्रयास के द्वारा नहीं,अपितु उन्हें भगवान् की सेवा में लगाए रखकर किया जा सकता है। जो व्यक्ति यह ह्रदयंगम कर लेता है कि कृष्णभावनामृत के द्वारा बुद्धि स्थिर होती है और इस कला का अभ्यास प्रामाणिक गुरु के पथ - प्रदर्शन में करता है,वह साधक अथवा मोक्ष का अधिकारी कहलाता है। 

क्रमशः !!! 🙏🙏             

सोमवार, 12 अप्रैल 2021

BHAGAVAD GITA 2:67

🙏🙏

इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनो नुविधीयते।

 तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि।।६७।।

इन्द्रियाणाम - इन्द्रियों को ; हि - निश्चय ही ; चरताम -विचरण करते हुए ; यत - जिसके साथ; मनः - मन ; अनुविधीयते - निरन्तर लगा रहता है ; तत - वह ; अस्य - इसको ; हरति - हर लेती है ; प्रज्ञाम - बुद्धि को ; वायुः - वायु ; नावम - नाव को ; इव - जैसे ; अम्भसि - जल में। 

जिस प्रकार पानी में तैरती नाव को प्रचण्ड वायु दूर बहा ले जाती है उसी प्रकार विचरणशील इन्द्रियों में से कोई एक जिस पर मन निरन्तर लगा रहता है, मनुष्य की बुद्धि को हर लेता है। 

तात्पर्य :-  यदि समस्त इन्द्रियाँ भगवान की सेवा में न लगी रहें और यदि इनमें से एक भी अपनी तृप्ति में लगी रहती है, तो वह भक्त को दिव्य प्रगति- पथ से विपथ कर सकती है। जैसा कि महाराज अम्बरीष के जीवन में बताया गया है, समस्त इन्द्रियों को कृष्णभावनामृत में लगा रहना चाहिए क्योंकि मन को वश में करने की यही सही एवं सरल विधि है। 

क्रमशः !!!🙏🙏

 

रविवार, 11 अप्रैल 2021

BHAGAVAD GITA 2:65/66

 प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते। 

प्रसन्नचेतसो ह्याश्रु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते।।६५।।

प्रसादे-भगवान् की अहैतुकी कृपा होने पर; सर्व-सभी; दुःखानाम -भौतिक दुःखों का;हानि -क्षय, नाश; अस्य-उसके; उपजायते-होता है; प्रसन्न-चेतसः-प्रसन्नचित  वाले की; हि-निश्चय ही; आशु -तुरन्त; बुद्धिः -बुद्धि; परि-पर्याप्त; अवतिष्ठते-स्थिर हो जाती है। 

इस प्रकार से कृष्णभावनामृत में तुष्ट व्यक्ति  के लिए संसार के तीनो ताप नष्ट हो जाते हैं और ऐसी तुष्ट चेतना होने पर उसकी बुद्धि शीघ्र ही स्थिर हो जाती है।

नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुतस्य भावना। 

न चाभावयतः शांतिरशान्तस्य कुतः सुखम।।६६।।

न अस्ति-नहीं हो सकती; बुद्धिः -दिव्य बुध्दि;  अयुक्तस्य-कृष्णभावना से शून्य पुरुष का; भावना-स्थिर चित ( सुख ); न -नहीं; च -तथा; अभवयतः-जो स्थिर नहीं है उसके; शांतिः-अशान्त का-अशान्त का; कुतः-कहा है; सुखम-सुख। 

जो कृष्णभावनामृत में परमेश्वर  से सम्बन्धित नहीं है उसकी न तो बुद्धि दिव्य होती है और न ही मन स्थिर होता है जिसके बिना शान्ति की कोई सम्भावना नहीं है।  शान्ति के बिना सुख हो भी कैसे सकता है ?  

तात्पर्य : कृष्णभावनाभावित हुए बिना शान्ति की कोई सम्भावना नहीं हो सकती। अतः पाँचवे अध्याय में (५ .२९ ) इसकी पुष्टि की गई है कि जब मनुष्य यह समझ लेता है कि कृष्ण ही यज्ञ तथा तपस्या के उत्तम फलों के एकमात्र भोक्ता हैं  और समस्त ब्रह्माण्ड के स्वामी हैं  तथा वे समस्त जीवों के असली मित्र हैं तभी उसे वास्तविक शान्ति मिल सकती है।  अतः यदि कोई कृष्णभावनाभावित नहीं है तो उसके मन का कोई अन्तिम लक्ष्य नहीं हो सकता। मन की चंचलता का एकमात्र कारण अन्तिम लक्ष्य का अभाव है। जब मनुष्य को यह पता चल जाता है कि कृष्ण ही भोक्ता, स्वामी तथा सबके मित्र हैं, तो स्थिर चित्त होकर शान्ति का अनुभव किया जा सकता है। अतएव जो कृष्ण से सम्बन्ध न रखकर कार्य में लगा रहता है, वह निश्चय ही सदा दुःखी और अशान्त रहेगा, भले ही वह जीवन में शान्ति तथा आध्यात्मिक उन्नति का कितना ही दिखावा क्यों न करे। कृष्णभावनामृत स्वयं प्रकट होने वाली शान्तिमयी अवस्था है, जिसकी प्राप्ति कृष्ण के सम्बन्ध से ही हो सकती है।

क्रमशः!!!! 

शनिवार, 10 अप्रैल 2021

BHAGAVAD GITA 2:64

 🙏🙏

रागद्वेषविमुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन। 

आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति।।६४।।  

राग -आसक्ति; द्वेष -तथा वैराग्य से; विमुक्तैः - मुक्त रहने वाले से; तू-लेकिन; विषयान-इन्द्रियविषयों को; इन्द्रियैः-इन्द्रियों के द्वारा; चरन - भोगता हुआ; आत्म-वश्यैः -अपने वश में; विधेय-आत्मा-नियमित स्वाधीनता पालक; प्रसादम -भगवत्कृपा को; अधिगच्छति-प्राप्त करता है।

किन्तु समस्त राग तथा द्वेष से मुक्त एवं अपनी इन्द्रियों को संयम द्वारा वश में करने में समर्थ व्यक्ति भगवान् की पूर्ण कृपा प्राप्त करता है। 

तात्पर्य :- यह पहले  बताया जा चुका है कि कृत्रिम विधि से इन्द्रियों पर वाह्य रूप से नियंत्रण किया जा सकता है, किन्तु जब तक इन्द्रियां भगवान् की दिव्य  सेवा में नहीं लगायी जाती, तब तक नीचे गिरने की सम्भावना बनी रहती हैं। यद्द्पि पूर्णतया कृष्णभावनाभावित व्यक्ति ऊपर से विषय-स्तर पर क्यों  न दिखे, किन्तु कृष्णभावनाभावित होने से वह विषय - कर्मों में आसक्त नहीं होता। उसका एक मात्र उद्देश्य  कृष्ण  को प्रसन्न करना रहता है, अन्य कुछ नहीं। अतः वह समस्त आसक्ति  विरक्ति से मुक्त होता है। कृष्ण की इच्छा होने पर भक्त सामान्यतया अवांछित कार्य भी कर सकता है, किन्तु यदि कृष्ण की इच्छा नहीं है तो वह उस कार्य को नहीं करेगा, जिससे वह सामान्य रूप से  अपने लिए करता हो। अतः कर्म करना या करना उसके वश में रहता है क्योंकि वह केवल कृष्ण के निर्देश के अनुसार ही कार्य करता है। यही चेतना भगवान् की अहैतुकी कृपा है, जिसकी प्राप्ति भक्त को इन्द्रियों में आसक्त होते हुए भी हो सकती है।

क्रमशः !!!       

शुक्रवार, 9 अप्रैल 2021

BHAGAVAD GITA 2:63

 क्रोधाद्भवति सम्मोहः ससम्मोहात्स्मृतिविभ्र्मः।

स्मृतिभ्रंशाद भुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यन्ति।।६२।।

क्रोधात -क्रोध से; भवति -होता है; सम्मोह -पूर्ण मोह; सम्मोहात-मोह से;स्मृति -स्मरणशक्ति का; बिभ्रमः  -मोह; स्मृति-भ्रंशात- स्मृति के मोह से; बुद्धिनाशः -बुद्धि का विनाश; बुद्धि-नाशात-तथा बुद्धि नाश से;प्रणश्यन्ति -अधः पतन होता है। 

क्रोध से पूर्ण मोह उत्पन्न होता है और मोह से स्मरणशक्ति का विभ्रम हो जाता है। जब स्मरणशक्ति भ्रमित हो जाती  है,तो बुद्धि नष्ट हो जाती है,और बुद्धि नष्ट होने पर मनुष्य भव -कूप में पुनः गिर जाता है। 

तात्पर्य :-श्रील रूप गोस्वामी ने हमें यह आदेश दिया है -

                            प्रापञ्चिकतया बुद्ध्या हरिसंम्बन्धिवस्तुनः।

    मुमुक्षुभिःपरित्यागो वैराग्यं फल्गु कथ्यते।  (भक्तिरसामृत  सिंधु  १.२.२५८ )

कृष्णभावनामृत  विकास  से मनुष्य जान सकता है कि प्रत्येक  उपयोग भगवान् की सेवा के लिए किया जा सकता है। जो कृष्णभावनामृत के ज्ञान से रहित हैं,वे कृत्रिम ढंग से भौतिक विषयों से वचने का प्रयास करते हैं,फलतः वे भवबंधन से मोक्ष की कामना करते हुए भी वैराग्य की चरम अवस्था को प्राप्त नहीं कर पाते।  तथाकथित वैराग्य फल्गु अर्थात गौण कहलाता है। .इसके विपरीत कृष्णभावनाभावित व्यक्ति जानता है कि प्रत्येक वस्तु का उपयोग भगवान् की सेवा में किसप्रकार किया जाय फलतः वह भौतिक चेतना का शिकार नहीं होता। उदाहरणार्थ,निर्विशेषवादी के अनुसार भगवान् निराकार होने के कारण भोजन नहीं कर सकते, अतः वह अच्छे खाद्दों से बचता रहता है, किन्तु भक्त  जानता है कि कृष्ण परम भोक्ता है और भक्तिपूर्वक उन  पर जो भी भेंट चढाई जाती है, उसे वे खाते है।  अतः भगवान को अच्छा भोजन चढ़ाने के बाद भक्त प्रसाद ग्रहण करता है। इस प्रकार हर वस्तु प्राणवान हो जाती है और अधः पतन का कोई संकट नहीं रहता। भक्त कृष्णभावनामृत में रहकर प्रसाद ग्रहण करता है जबकि अभक्त इसे पदार्थ के  के रूप में तिरस्कार कर देता है। अतः निर्विशेषवादी अपने  कृत्रिम त्याग के कारण जीवन को भोग  नहीं  पाता और यही  कारण है कि मन के थोड़े से विचलन से वह भव -कूप में पुनः आ गिरता है। कहा जाता है कि मुक्ति के स्तर तक पहुँच जाने पर भी ऐसा जीव  नीचे गिर जाता  है, क्योंकि उसे भक्ति का कोई आश्रय नहीं मिलता। 

  क्रमशः !!!

गुरुवार, 8 अप्रैल 2021

BHAGAVAD GITA 2:62

🙏🙏

 ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते। 

सङ्गात्सन्नजायते  कामः कामातक्रोधोभिजायते।।६२।।

 ध्यायतः-चिन्तन करते हुए ; विषयान -इन्द्रिय विषयों को; पुंसः मनुष्य की; सङ्गात-आसक्ति से; संञ्जायते-विकसित होती है; कामः -इच्छा; कामात-काम से; क्रोधः -क्रोध; अभिजायते -प्रकट होता है। 

इन्द्रियविषयों का चिंतन करते हुए मनुष्य की उनमे आसक्ति उत्पन्न हो जाती है और ऐसी आसक्ति से काम उत्पन्न होता है और फिर काम से क्रोध प्रकट होता है। 

तात्पर्य :-जो मनुष्य कृष्णभावनाभावित नहीं है उसमे इन्द्रियविषयों के चिंतन से भौतिक इच्छाएं उत्पन्न होती हैं। इन्द्रियों को किसी न किसी कार्य में लगा रहना चाहिए और यदि वे भगवान् की दिव्य प्रेमा भक्ति में   नहीं लगी रहेंगी तो वे निश्चय ही भौतिकतावाद में लगना  चाहेंगी। इस भौतिक  जगत में हर एक प्राणी इन्द्रियविषयों के अधीन है,यहाँ तक कि ब्रह्माँ तथा शिवजी भी। तो स्वर्ग के अन्य देवताओं के विषय में क्या कहा जा सकता है  ? इस संसार  के जंजाल से  निकलने का एक मात्र उपाय है -कृष्णभावनाभावित होना। शिव ध्यानमग्न थे,किन्तु पार्वती ने विषयभोग के लिए उन्हें उत्तेजित किया,तो  सहमत हो गए जिसके फलस्वरूप कार्तिकेय का  जन्म हुआ। इसी प्रकार तरुण भगवत्भक्त हरिदास ठाकुर को माया देवी के अवतार ने मोहित करने   का प्रयास किया,किन्तु विशुद्ध कृष्ण भक्ति  के कारण वे इस कसौटी में खरे उतरे। जैसा कि यमुनाचार्य  के उपर्युक्त श्लोक में बताया  जा चुका है,भगवान् का एकनिष्ठ भक्त भगवान् की संगति के आध्यत्मिक सुख का आस्वादन करने के कारण समस्त भौतिक इन्द्रियसुख को त्याग देता है। अतः जो कृष्णभावनाभावित नहीं है,वह कृत्रिम दमन के द्वारा अपनी इन्द्रियों को वश में करने में कितना ही शक्तिशाली क्यों न हो,अंत में अवश्य असफल होगा,क्योंकि विषय सुख का रंचमात्र विचार भी उसे इन्द्रियतृप्ति के लिए उत्तेजित कर देगा।

क्रमशः !!! 

बुधवार, 7 अप्रैल 2021

BHAGAVAD GITA 2:61

 🙏🙏

तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः। 

वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।।६१।। 

तानी- उन इन्द्रियों को; सर्वाणि-समस्त; संयम्य-वश करके; युक्त -लगा हुआ; आसीत-स्थित होना चाहिए; मत-पर -मुझमे; वशे -पूर्णतया वश में; हि-निश्चय ही; यस्य-जिसकी; तस्य -उसकी; प्रज्ञा -चेतना; प्रतिष्ठिता -स्थिर। 

 जो इन्द्रियों को पूर्णतया वश में रखते हुए इन्द्रिय -संयमन  करता है और अपनी चेतना को मुझमे स्थिर कर देता है, वह मनुष्य स्थिरबुद्धि कहलाता है। 

तात्पर्य :- इस श्लोक में बताया गया है कि योगसिद्धि की चरम अनुभूति कृष्णभावनामृत ही है। जब तक कोई कृष्णभावनाभावित नहीं होता तब तक इन्द्रियों को वश में करना सम्भव नहीं है। जैसा कि पहले कहा जा चुका है,दुर्वाशा मुनि का झगड़ा  महाराज अम्बरीष से हुआ,क्योकि वे गर्ववश महाराज अम्बरीष  पर क्रुद्ध हो गए,जिससे अपनी इन्द्रियों को रोक नहीं पाए दूसरी ओंर यद्धपि राजा मुनि के समान योगी न था,किन्तु वह कृष्ण का भक्त था और उसने मुनि के सारे अन्याय सह लिये,जिससे वह विजयी हुआ। राजा अपनी इन्द्रियों को वश में कर सका क्योंकि उसमे निम्नलिखित गुण थे,जिनका उल्लेख श्रीमदभागवत में (१. ४. १८. २० )हुआ है -

स वै मनः कृष्णपदारविन्दयोर्वचांसि वैकुंठगुणानुवर्णने। 

करौ हरेर्मन्दिरमार्जनादिषु   श्रुति चक्राच्युतसत्कथोदये।।

मुकुंदलिङ्गालयदार्शने  दृशौ तद्भृत्यगात्रस्पृशेगसंगमम। 

घ्राणं  च तत्पादसरोजसौरभे  श्रीमतुलस्या  रसनां तदर्पाति।। 

पादौ हरेः क्षेत्रपादानुसर्पणे  शिरों हृषीकेशपदाभिवंदने।

कामं च दास्ये न तु  कामकाम्यया यथोत्तमश्लोकजनाश्रया रतिः।। 

"राजा अंबरीष ने अपना मन भगवान् कृष्ण के चरणारविन्दों पर स्थिर कर दिया है अपनी वाणी भगवान् के धाम की चर्चा करने में लगा दी,अपने कानों को भगवान् की लीलाओं के सुनने में,अपने हाथों को भगवान् का मंदिर साफ़ करने में,अपनी आँखों को भगवान् का स्वरुप देखने में,अपने शरीर को भक्त के शरीर का स्पर्श करने में, अपनी नाक को भगवान् के चरणारविन्दों पर भेंट किये  गये फूलों की गन्ध सूंघने में,अपनी जीभ को उन्हें अर्पित तुलसी दलों काआस्वाद करने में,अपने पावों को जहाँ -जहाँ भगवान्  के मंदिर हैं, उन  स्थानों की यात्रा करने में,अपने सिर को भगवान् को नमस्कार करने में तथा अपनी इच्छाओं को भगवान की इच्छाओं को पूरा करने में लगा दिया और इन गुणों के कारण वे भगवान् के मत्पर भक्त बनने के योग्य हो गए। 

इस प्रसंग में मत्पर शब्द अत्यंत सार्थक है। कोई मत्पर किस तरह हो सकता है इसका वर्णन महाराज अंबरीष के जीवन में बताया गया है। मत्पर परम्परा के महान विद्वान् तथा आचार्य श्रील बलदेव विद्याभूषण का  कहना है -मद्भक्ति प्रभावेन सर्वेन्द्रियविजयपूर्विका  स्वात्मदृष्टिः सुलभेति भावः -इन्द्रियों को केवल कृष्ण की भक्ति के बल से वश में किया जा सकता है-कभी-कभी अग्नि का भी उदाहरण दिया जाता है -"जिस प्रकार जलती हुई अग्नि कमरे  की सारी वस्तुएँ जला देती है उसी प्रकार  योगी के ह्रदय में स्थित भगवान् विष्णु सारे मलों को जला देते हैं"। योग -सूत्र भी विष्णु का ध्यान आवश्यक बताता है,शून्य का नहीं। तथाकथित योगी जो विष्णु पद को छोड़कर अन्य किसी वास्तु का ध्यान धरते हैं,वे केवल मृगमरीचिकाओं की खोज में वृथा ही अपना समय गंवाते हैं। हमें कृष्णभावनाभावित होना चाहिए -भगवान् के प्रति अनुरक्त होना चाहिए। असली योग का यही उद्देश्य है।

क्रमशः  🙏🙏        

 

                                                                                                                                                                                                     

सोमवार, 5 अप्रैल 2021

BHAGAVAD GITA 2:60

🙏🙏

ययतो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः। 

इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति परसभं मनः।।६०।।

यतत:-प्रयत्न करते हुये; हि -निश्चय ही; अपि-के बावजूद; कौन्तेय -हे कुन्तीपुत्र; पुरुषस्य - मनुष्य की; विपश्चित -विवेक से युक्त; इन्द्रियाणि-इन्द्रियां; प्रमाथीनि-उत्तेजित; हरन्ति -फेंकती हैं; प्रसभम -बल से; मनः-मन को।

हे अर्जुन ! इन्द्रियां इतनी प्रबल तथा वेगवान हैं कि विवेकी पुरुष के मन को भी बलपूर्वक हर लेती हैं,जो उन्हें वश करने का  प्रयत्न करता है। 

तात्पर्य :-अनेक विद्वान,ऋषि,दार्शनिक तथा अध्यात्मवादी इन्द्रियों को वश में करने का प्रयत्न करते हैं,किन्तु उनमे से बड़े से बड़ा भी कभी -कभी विचलित मन के कारण इन्द्रियभोग का लक्ष्य बन जाता है। यहाँ तक कि विश्वामित्र जैसे महर्षि तथा पूर्ण योगी को मेनका के साथ विषय भोग में प्रवृत होना पड़ा,यद्दपि वे इन्द्रिय निग्रह के लिए कठिन तपस्या तथा योग कर रहे थे। विश्व इतिहास में तरह अनेक दृष्टान्त हैं। अतः पूर्णतया कृष्णभावनाभावित  हुए बिना मन तथा इन्द्रियों को वश में कर  सकना अत्यंत कठिन है। मन को कृष्ण में लगाये बिना मनुष्य ऐसे भौतिक कार्यों को बंद नहीं कर सकता।  परम साधु तथा भक्त यामुनाचार्य ने एक व्यावहारिक उदहारण प्रस्तुत किया है।  कहते हैं -

यदविधि  मम चेतः कृष्णपदारविन्दे 

              नवनवरसधामान्युद्यतं रन्तुमासीत। 

तदवधि बत नारीसंगमे स्मर्यमाने 

            भवति मुखविकारः सुष्ठु निष्ठीवनं च।।

"जब से मेरा मन भगवान् कृष्ण  के चरणारविन्दों की सेवा में लग गया है और जब से मैं नित्य नव दिव्य रस का अनुभव  करता हूँ,तब से स्त्री प्रसंग का विचार आते ही मेरा मन उधर से फिर जाता है और मैं ऐसे विचार का थू -थू करता हूँ।"

कृष्णभावनामृत इतनी दिव्य सुन्दर वस्तु है कि इसके प्रभाव से भौतिक भोग स्वतः नीरस हो जाता है। यह वैसा ही है जैसे कोई भूखा मनुष्य प्रचुर मात्रा में पुष्टिदायक भोजन करके अपनी भूख मिटा ले। महाराज अंबरीष भी परम योगी दुर्वासा मुनि पर इसलिए विजय पा सके क्योंकि उनका मन निरन्तर कृष्णभावनामृत में लगा रहता था। (स वै मनः कृष्णपदारविन्दयोः वचांसि बैकुंठगुणानुवर्णने) 

क्रमशः !!! 🙏🙏


     

   

  

  


शुक्रवार, 2 अप्रैल 2021

BHAGAVAD GITA 2:59

🙏🙏


 

विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः।



रसवर्ज रसोप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते।।५९।।



विषया -इन्द्रिय भोग की वस्तुएँ;विनिवर्तन्ते -दूर रहने के लिए अभ्यास की जाती है; निराहारस्य -निषेधात्मक प्रतिबंधों से; देहिनः -देहवान जीव के लिए;रास -वर्जम-स्वाद का त्याग करता है; रस:-भोगेच्छा; अपि -यद्धपि है; अस्य -उसका; परम -अत्यन्त उत्कृष्ट वस्तुएँ; दृष्टा -अनुभव होने पर;निवर्तते -वह समाप्त हो जाता है। 

देहधारी जीव इन्द्रिय भोग से भले ही निवृत हो जाये पर उसमे इन्द्रिय भोगों की इच्छा बनी रहती है। लेकिन उत्तम रस के अनुभव होने से ऐसे कार्यों को बंद करने पर वह भक्ति में स्थिर हो जाता है। 

तात्पर्य :-जब कोई अध्यात्म को प्राप्त न हो तब तक इन्द्रियभोग से वितरित होना असम्भव है। विधि -विधानों द्वारा इन्द्रियभोग को संयमित करने की विधि वैसी ही है जैसे किसी रोगी के किसी भोज्य पदार्थ खाने पर प्रतिबंध लगाना। किन्तु इससे रोगी की न तो भोजन के प्रति रूचि समाप्त होती है और न वह ऐसा प्रतिबन्ध लगाया जाना चाहता है। इसी प्रकार अल्पज्ञानी व्यक्तियों के लिए इन्द्रियसंयमन के लिए अष्टांग योग जैसी विधि की संस्तुति की जाती है जिसमे यम,नियम,आसन,प्राणायाम,प्रत्याहार,धारणा,ध्यान आदि सम्मिलित हैं। किन्तु जिसने कृष्णभावनामृत के पथ पर प्रगति के क्रम में परमेश्वर कृष्ण के सौन्दर्य का रसास्वादन  कर लिया है, उसे जड़ भौतिक वस्तुओं में कोई रूचि नहीं रह जाती। ऐसे प्रतिबन्ध अल्पज्ञानी नवदीक्षितों के लिए हैं। ऐसे प्रतिबन्ध तभी ठीक हैं,जब तक कृष्णभावनामृत में रूचि जागृत नहीं जाती जब वास्तव में रूचि जग जाती है,तो मनुष्य में स्वतः ऐसी वस्तुओं के प्रति अरुचि उत्पन्न हो जाती है। 

क्रमशः !!! 🙏🙏