रविवार, 20 मार्च 2022

पुरानी यादें

 समय की नजाकत भी क्या खूबसूरत होती है, ८० तथा ९० के दशक तक के लोग किस तरह से चिट्ठी पत्री के द्वारा अपनी बात या प्यार किस तरह से एक दूसरे तक पहुंचाते थे,सायद उस जमाने के लोगों को याद होगा किस तरह से चिट्ठी भी आँसुओं से भीग जाती थी। 

जब एक माँ अपने प्रदेश में रहने वाले बेटे की चिट्ठी किसी से पढ़वाती थी,तो रोने के बाद भी चिट्ठी कई दिनों तक सीने से लगा के रखती थी,ठीक वैसे ही पति की चिट्ठी,और प्रदेश में रहने वाला पति भी पत्नी की चिट्ठी पढ़ कर  याद  में अश्रुओं की धार के सिवा कुछ नहीं कर सकता था। 

आज के जमाने में तो उस दर्द और प्यार भरे शब्दों को लोग मैसेज में भी नहीं लिख सकते,किन्तु चिट्ठी में कुछ और ही प्यार और पीड़ा का आदान प्रदान होता था,तथा बहिनें भी रक्षाबन्धन को न आ सकी तो चिट्ठी में थोड़ा सिंदूर और चावल के दाने भेज देती थीं। 

और ये फ़िल्मी गाना  तो इसी लिए हिट और फेमस भी हुआ होगा लोग खत में इस गाने की लाइनें भी लिख देते थे। फूल तुम्हें भेजा है खत में..... 

(यू ट्यूब साभार )

बुधवार, 9 मार्च 2022

पाँच लिंकों का आनन्द: 3327..ज़रा सा हक़ दे गई..

पाँच लिंकों का आनन्द: 3327..ज़रा सा हक़ दे गई..:  ।। उषा स्वस्ति।। बम घरों पर गिरें कि सरहद पर रूहे-तामीर ज़ख़्म खाती है खेत अपने जलें या औरों के ज़ीस्त फ़ाक़ों से तिलमिलाती है। इसलिए ऐ शरी...

रविवार, 15 अगस्त 2021

BHAGAVAD GITA 3:43

 🙏🙏

एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना। 

जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरसादम।। 

एवम-इस प्रकार;  बुद्धेः -बुद्धि से; परम -श्रेष्ठ ; बुद्ध्वा -जानकार ; संस्तभ्य -स्थिर करके ; आत्मानम -मन को ;आत्मना -सुविचारित बुद्धि द्वारा ; जहि -जीतो ; शत्रुम -शत्रु को ; महा-बाहो -हे महाबाहु ; काम-रूपम -काम के रूप में ; दुरसादम -दुर्जेय। 

इस प्रकार हे महाबाहु अर्जुन ! अपने आपको भौतिक इन्द्रियों, मन तथा बुद्धि से परे जान कर और मन को सावधान आद्यात्मिक बुद्धि (कृष्णभावनामृत ) से स्थिर करके आद्यात्मिक शक्ति द्वारा  इस काम -रुपी शत्रु को जीतो। 

तात्पर्य :-भगवद्गीता का यह तृतीय अध्याय निष्कर्षतः मनुष्य को निर्देश देता है कि वह निर्विशेष शुन्यवाद को चरम मानकर अपने आपको भगवान् का शाश्वत सेवक समझते हुए( कृष्णभावनामृत) में प्रवृत हो। भौतिक जीवन में मनुष्य काम तथा प्रकृति पर प्रभुत्व पाने की इच्छा से प्रभावित होता है। प्रभुत्व तथा इन्द्रियतृप्ति की इच्छाएं बद्धजीव की परम शत्रु हैं , किन्तु कृष्णभावनामृत की शक्ति से मनुष्य इन्द्रियों,मन तथा बुद्धि पर नियंत्रण रख सकता है। इसके लिए मनुष्य को सहसा अपने नियत कर्मो को बंद करने की आवश्यकता नहीं है ,अपितु धीरे-धीरे कृष्णभावनामृत विकसित करके भौतिक इन्द्रियों तथा मन से प्रभावित हुए बिना  स्वरूप के प्रति लक्षित स्थिर बुद्धि से दिव्य स्थिति को प्राप्त हुआ जा सकता है। यही इस अध्याय का सारांश है। सांसारिक जीवन की अपरिपक्व अवस्था में दार्शनिक चिंतन तथा योगिक साधनों के अभ्यास से इन्द्रियों को वश में करने के कृत्रिम प्रयासों से आध्यात्मिक जीवन प्राप्त करने में सहायता नहीं मिलती। उसे श्रेष्ठ बुद्धि द्वारा कृष्णभावनामृत में प्रशिक्षित होना चाहिए। 

 इस प्रकार श्रीमदभगवदगीता के तृतीय अध्याय  "कर्मयोग" का भक्तिवेदांत तात्पर्य पूर्ण हुआ। 

क्रमशः!!!🙏🙏  

मंगलवार, 13 जुलाई 2021

BHAGAVAD GITA 3:42

 🙏🙏इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः। 

मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः।।४२।।🙏🙏

इन्द्रियाणि -इन्द्रियों को; पराणी -श्रेष्ठ; आहुः -कहा जाता है; इन्द्रियेभ्यः--इन्द्रियों से बढ़कर; परम -श्रेष्ठ; मनः -मन; मनसः -मन की अपेक्षा; तु -भी; परा -श्रेष्ठ; बुद्धि -बुद्धि; यः -जो; बुद्धेः -बुद्धि से भी; परतः -श्रेष्ठ; तु -किन्तु; सः -वह। 

कर्मेन्द्रियाँ जड़ पदार्थ की अपेक्षा श्रेष्ठ हैं, मन इन्द्रियों से बढ़कर है, बुद्धि मन से भी उच्च है और वह (आत्मा )बुद्धि से भी बढ़कर है। 

तात्पर्य :-इन्द्रियां काम के कार्यकलापों के विभिन्न द्वार हैं। काम का निवास शरीर में है,किन्तु उसे इन्द्रिय रूपी झरोखे प्राप्त हैं। अतः कुल मिलाकर इन्द्रियां शरीर से श्रेष्ठ हैं। श्रेष्ठ चेतना या कृष्णभावनामृत होने पर ये द्वार काम में नहीं आते। कृष्णभावनामृत में आत्मा भगवान् के साथ सीधा सम्बन्ध स्थापित करता है, अतः यहाँ पर वर्णित शारीरिक कार्यों की श्रेष्ठता परमात्मा में आकर समाप्त हो जाती है। शारीरिक कर्म का अर्थ है -इन्द्रियों  के कार्य और इन इन्द्रियों के अवरोध का अर्थ है -सारे शारीरिक कर्मों का अवरोध। लेकिन चूंकि मन सक्रिय रहता है, अतः शरीर के मौन तथा स्थिर रहने पर मन कार्य करता है -यथा स्वप्न के समय मन कार्यशील रहता है। किन्तु मन के ऊपर भी बुद्धि की संकल्पशक्ति होती है और बुद्धि के ऊपर भी स्वयं आत्मा है। अतः यदि आत्मा प्रत्यक्ष रूप में परमात्मा में रत रहे तो अन्य सारे अधीनस्थ -यथा-बुद्धि, मन तथा इन्द्रियां -स्वतः रत हो जायेंगे। कठोपनिषद में एक ऐसा ही अंश है जिसमे कहा गया है कि इन्द्रिय-विषय इन्द्रियों से श्रेष्ठ है और मन इन्द्रिय -विषयों से श्रेष्ठ है। अतः यदि मन भगवान् की सेवा में निरंतर लगा रहता है तो इन इन्द्रियों के अन्यत्र रत होने की सम्भावना नहीं रह जाती। इस मनोवृति की विवेचना की जा चुकी है। परं दृष्टा निवर्तते -यदि मन भगवान् की दिव्य सेवा में लगा रहे तो तुच्छ विषयों में उसके लग पाने की सम्भावना नहीं रह जाती। कठोपनिषद में आत्मा को महान कहा गया है। अतः आत्मा इन्द्रिय-विषयों, मन तथा बुद्धि -इन सबके ऊपर है। अतः  सारी समस्या का हल  यह है कि आत्मा के स्वरुप को प्रत्यक्ष समझा जाय। 

मनुष्य को चाहिए कि बुद्धि के द्वारा आत्मा की स्वाभाविक स्थिति को ढूंढे और मन को निरंतर कृष्णभावनामृत में लगाये रखे। इससे सारी समस्या हल हो जाती है। सामान्यतः नवदीक्षित अध्यात्मवादी को इन्द्रिय-विषयों से दूर रहने की सलाह दी जाती है। किन्तु इसके साथ-साथ मनुष्य को अपनी बुद्धि का उपयोग करके मन को सशक्त बनाना होता है। यदि कोई बुद्धिपूर्वक अपने मन भगवान के शरणागत होकर कृष्णभावनामृत में लगा  रहता है,तो मन स्वतः सशक्त हो जाता है और यद्धपि इन्द्रियां सर्प के समान अत्यंत बलिष्ठ होती हैं, किन्तु  ऐसा करने पर वे दन्त विहीन सापों के समान अशक्त हो जाएँगी। यद्धपि आत्मा बुद्धि,मन तथा इन्द्रियों का भी स्वामी है तो भी जब तक इसे कृष्ण की संगति द्वारा कृष्णभावनामृत में सुदृढ़ नहीं कर लिया जाता, तब तक चलायमान मन के कारण नीचे गिरने की पूरी-पूरी सम्भावना बनी रहती है। 

क्रमशः !!!!   🙏🙏      

सोमवार, 21 जून 2021

BHAGAVAD GITA 3:41

तस्मात्वमिन्द्रियाणयादो  नियम्य भरतर्षभ। 

पाप्मानं प्रजहि ह्योनं ज्ञानविज्ञाननाशनम।।

तस्मात्-अतः; त्वम -तुम; इन्द्रियाणि -इन्द्रियों को; आदौ-प्रारम्भ में; नियम्य -नियमित करके; भरत-ऋषभ-हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ; पाप्मानम-पाप के महान प्रतीक को; प्रजहि -दमन करो; हि-निशाय ही; एनम -इस; ज्ञान-ज्ञान; विज्ञान-तथा शुद्ध आत्मा के वैज्ञानिक ज्ञान का; नाशनम -संहर्ता,विनाश करने वाला। 

इसलिए हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ अर्जुन ! प्रारम्भ में ही इन्द्रियों को वश में करके इस पाप के महान प्रतीक (काम ) का दमन करो ज्ञान तथा आत्म-साक्षात्कार के इस विनाशकर्ता का वध करो। 

तात्पर्य :-भगवान् ने अर्जुन को प्रारम्भ से ही इन्द्रिय-संयम करने का उपदेश दिया जिससे वह सबसे पापी शत्रु काम का दमन कर सके,जो आत्म -साक्षात्कार तथा आत्मज्ञान की उत्कंठा को विनष्ट करने वाला है। ज्ञान का अर्थ है आत्म तथा अनात्म के भेद का बोध अर्थात यह ज्ञान कि आत्मा शरीर नहीं है। विज्ञान से आत्मा की स्वाभाविक स्थिति तथा परमात्मा के साथ उसके सम्बन्ध का विशिष्ट ज्ञान सूचित होता है। श्रीमदभागवत में (२.९.३१ ) इसकी विवेचना इस प्रकार हुई है -

ज्ञानं परमगुह्यं में यद्विज्ञानसमन्वितम। 

सरहस्यम तदङ्गं च गृहाण गदितं माया।। 

"आत्मा तथा परमात्मा का ज्ञान अत्यंत गुह्य एवं रहस्यमय है,किन्तु जब स्वयं भगवान् द्वारा इसके विविध पक्षों की विवेचना की जाती है तो ऐसा ज्ञान तथा विज्ञान समझा जा सकता है।" भगवतगीता हमें आत्मा का सामान्य तथा विशिष्ट ज्ञान (ज्ञान तथा विज्ञान) प्रदान करती है। जीव भगवान् के भिन्न अंश हैं,अतः वे भगवान् की सेवा के लिए हैं। यह चेतना कृष्णभावनामृत कहलाती है। अतः मनुष्य को जीवन के प्रारम्भ से इस कृष्णभावनामृत को सीखना होता है,जिससे वह पूर्णतया कृष्णभावनाभावित होकर तदनुसार कर्म करे। 

काम-ईश्वर प्रेम का विकृत प्रतिबिम्ब है और प्रत्येक जीव के लिए स्वाभाविक है। किन्तु यदि किसी को प्रारम्भ से ही कृष्णभावनामृत की शिक्षा दी जाय तो प्राकृतिक ईश्वर-प्रेम काम के रूप में विकृत नहीं हो सकता। एक बार ईश्वर-प्रेम के काम रूप में विकृत हो जाने पर इसके मौलिक स्वरूप को पुनः प्राप्त कर पाना दुःसाध्य हो जाता है। फिर भी,कृष्णभावनामृत इतना शक्तिशाली होता है कि विलम्ब से प्रारम्भ करने वाला भी भक्ति के विधि-विधानों का पालन करके ईश्वरप्रेमी बन सकता है। अतः जीवन की किसी भी अवस्था में, या जब भी इसकी अनिवार्यता समझी जाए,मनुष्य कृष्णभावनामृत या भगवद्भक्ति के द्वारा इन्द्रियों को वश में करना प्रारम्भ कर सकता है और काम को भगवत्प्रेम में बदल सकता है,जो मानव जीवन की पूर्णता की चरम अवस्था है। 

क्रमशः !!! 🙏🙏  

रविवार, 20 जून 2021

BHAGAVAD GITA 3:40

🙏🙏

इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्च्ते। 

एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम।।४०।।

इन्द्रियाणि -इन्द्रियाँ; मनः -मन; बुद्धिः -बुद्धि; अस्य -इस काम का; अधिष्ठानम -निवासस्थान

उच्चते -कहा जाता है; एतै -इन सबों से; विमोहयति -मोहग्रस्त करता है; एषः-यह काम; ज्ञानम-ज्ञान को; आवृत्य-ढक कर; देहिनम-शरीरधारी को। 

इन्द्रियाँ,मन तथा बुद्धि इस काम के निवासस्थान हैं। इनके द्वारा यह काम जीवात्मा के वास्तविक ज्ञान को ढक कर उसे मोहित कर लेता है। 

तात्पर्य :-चूँकि शत्रु ने बद्धजीव के शरीर के विभिन्न सामरिक स्थानों पर अपना अधिकार कर लिया है, अतः भगवान् कृष्ण उन स्थानों का संकेत कर रहे हैं जिससे शत्रु को जीतने वाला यह जान ले कि शत्रु कहाँ पर है। मन समस्त इन्द्रियों के कार्यकलापों का केंद्र बिंदु है,अतः जब हम इन्द्रिय-विषयों के सम्बन्ध में सुनते हैं तो मन इन्द्रियतृप्ति के समस्त भावों का आगार बन जाता है। इस तरह मन तथा इन्द्रियां काम की शरणस्थली बन जाते हैं। इसके बाद बुद्धि ऐसी कामपूर्ण रुचियों की राजधानी बन जाती है। बुद्धि आत्मा की निकट पड़ोसिन है। काममय बुद्धि से आत्मा प्रभावित होता है जिससे उसमे अहंकार उत्पन्न होता है और वह पदार्थ से तथा इस प्रकार मन तथा इन्द्रियों से अपना तादात्म्य कर लेता है। आत्मा को भौतिक इन्द्रियों का भोग करने की लत पद जाती है,जिसे वह वास्तविक सुख मान बैठता है।श्रीमदभागवत में ( १०.८४. १३ ) आत्मा के इस मिथ्या स्वरूप की अत्युत्तम विवेचना की गई है -

यस्यात्मबुद्धिः कुणपे त्रिधातुके स्वधीः कलत्रादिषु भौम इज्यधीः।

यतीर्थबुद्धिः सलिले न करहिचिज्जनेष्वभिज्ञेषु  स एव  गोखरः।।

"जो मनुष्य इस त्रिधातु निर्मित शरीर को आत्मस्वरूप जा बैठता है,जो देह के विकारों को स्वजन समझता है,जो जन्मभूमि को पूज्य मानता है और जो तीर्थस्थलों की यात्रा दिव्यज्ञान वाले पुरुष से भेंट करने के लिए नहीं,अपितु स्नान करने के लिए करता है,उस गधा या बैल के समान समझना चाहिए। "

क्रमशः !!!🙏🙏   

      

शनिवार, 19 जून 2021

BHAGAVAD GITA 3:39

🙏🙏

आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा। 

कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च।।

आवृतं -ढका हुआ; ज्ञानम -शुद्ध चेतना; एतेन -इससे; ज्ञानिनः-ज्ञाता का; नित्य -वैरिणा -नित्य शत्रु द्वारा; काम-रूपेण -काम के रूप में; कौन्तेय-हे कुन्तीपुत्र; दुष्पूरेण -कभी भी तुष्ट न होने वाली; अनलेन -अग्नि द्वारा; च -भी।

इस प्रकार ज्ञानमय जीवात्मा की शुद्ध चेतना उसके काम रूपी नित्य शत्रु से ढकी रहती है, जो कभी भी तुष्ट नहीं होता और अग्नि के समान जलता रहता है। 

तात्पर्य :-मनुस्मृति में कहा गया है कि कितना भी विषय -भोग क्यों न किया जाय काम की तृप्ति नहीं होती,जिस प्रकार कि निरन्तर ईंधन डालने अग्नि कभी नहीं बुझती। भौतिक जगत में समस्त कार्यकलापों का केन्द्रबिन्दु मैथुन ( कामसुख ) है, अतः इस जगत को मैथुन्य -आगार या विषयी-जीवन की हथकडियाँ कहा गया है। एक समान्य बन्दीगृह में अपराधियों को छड़ों के भीतर रखा जाता है इसी प्रकार जो अपराधी भगवान् के नियमों की अवज्ञा करते है, वे मैथुन जीवन द्वारा बंदी बनाये जाते है। इन्द्रियतृप्ति के आधार पर भौतिक सभ्यता की प्रगति का अर्थ है, इस जगत में जीवात्मा की बन्धन अवधि को बढ़ाना। अतः यह काम अज्ञान का प्रतीक है जिसके द्वारा जीवात्मा को इस संसार मे रखा जाता है। इन्द्रियतृप्ति का भोग करते समय हो सकता है कि कुछ प्रसन्नता की अनुभूति हो,किन्तु यह प्रसन्नता की अनुभूत्ति ही इन्द्रियभोक्ता का चरम शत्रु है। 

क्रमशः !!!🙏🙏  

शुक्रवार, 18 जून 2021

BHAGAVAD GITA 3:38

🙏🙏 धूमेनाव्रियते वर्यह्निःथादर्शो  मलेन च। 

यथोल्बेनाव्रतो गर्भस्तथा तेनेदमावर्तम।।३८।।

धूमेन -धुएँ से; आव्रियते- ढक जाती है; वह्निः-अग्नि; यथा -जिस प्रकार;आदर्श -शीशा,दर्पण; मलेन-धूल से; च-भी; यथा-जिस प्रकार; उल्बेन-गर्भाशय द्वारा; आवृतः -ढका रहता है; गर्भः -भ्रूण,गर्भ; तथा-उसी प्रकार; तेन -काम से; इदम-यह; आवृतम -ढका है। 

जिस प्रकार अग्नि धुएँ से,दर्पण धूल से अथवा भ्रूण गर्भाशय से आवृत रहता है, उसी प्रकार जीवात्मा इस काम की विभिन्न मात्राओं से आवृत रहता है। 

तात्पर्य :-जीवात्मा के आवरण की तीन कोटियां हैं जिनसे उसकी शुद्ध चेतना धूमिल होती है। यह आवरण काम ही है, जो विभिन्न स्वरूपों में होता है यथा अग्नि में धुआँ, दर्पण पर धूल तथा भ्रूण पर गर्भाशय। जब काम की उपमा धूम्र से दी जाती है तो यह समझना चाहिए कि जीवित स्फुल्लिंग की अग्नि कुछ-कुछ अनुभवगम्य है। दूसरे शब्दों में, जब जीवात्मा अपने कृष्णभावनामृत को कुछ-कुछ प्रकट करता है तो उसकी उपमा धुएँ से आवृत अग्नि से दी जा सकती है। यद्धपि जहाँ कहीं धुआँ होता है वहां अग्नि का होना अनिवार्य है, किन्तु प्रारम्भिक अवस्था में अग्नि की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति नहीं होती। यह अवस्था कृष्णभावनामृत के सुभारम्भ जैसी है। दर्पण पर धूल का उदहारण मन रुपी दर्पण को अनेकानेक आध्यात्मिक विधियों से स्वच्छ करने की प्रक्रिया के समान है। इसकी सर्वश्रेष्ठ विधि है -भगवान् के पवित्र नाम का संकीर्तन। गर्भाशय द्वारा आवृत भ्रूण  दृष्टांत असहाय अवस्था से दिया गया है, क्योंकि गर्भ -स्थित शिशु इधर-उधर हिलने के लिए भी स्वतंत्र नहीं रहता। जीवन की यह अवस्था वृक्षों के समान है। वृक्ष भी जीवात्माएं हैं,किन्तु उनमे काम की प्रबलता को देखते हुए उन्हें ऐसी योनि मिली है कि वे प्रायः चेतनाशून्य होते हैं। धूमिल दर्पण पशु-पक्षियों के समान है और धूम्र से आवृत अग्नि मनुष्य के सामान है। मनुष्य के रूप में जीवात्मा में थोड़ा बहुत कृष्णभावनामृत का उदय होता है और यदि वह और प्रगति करता है तो आध्यात्मिक जीवन की अग्नि मनुष्य जीवन में प्रज्वलित हो सकती है। यदि अग्नि के धुएँ को ठीक से नियंत्रित किया जाय तो अग्नि जल सकती है, अतः यह मनुष्य जीवन जीवात्मा के लिए ऐसा सुअवसर है जिससे वह संसार के बन्धन से छूट सकता है। मनुष्य जीवन में काम रुपी शत्रु को योग्य निर्देशन में कृष्णभावनामृत के अनुशीलन द्वारा जीता जा सकता है। 

क्रमशः !!! 🙏🙏       

सोमवार, 14 जून 2021

BHAGAVAD GITA 3:37

 श्रीभगवानुवाच 

🙏🙏

काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः। 

महाशनो महापाप्मा विद्धयेनमिह वैरिणम।।३७।।

श्री-भगवानुवाच -श्रीभगवान ने कहा; कामः विषयवासना; एषः -यह; क्रोधः-क्रोध; एषः-यह; रजः-गुण-रजोगुण से; समुद्भवः -उत्पन्न; महा-अशनः -सर्वभक्षी; महा-पापम्या -महान पापी; विद्धि--जानो; एनम-इसे; इह-इस संसार में; वैरिणम -महान शत्रु। 

श्रीभगवान् ने कहा-हे अर्जुन ! इसका कारण रजोगुण के सम्पर्क से उत्पन्न काम है, जो बाद में क्रोध का रूप धारण करता है और जो इस संसार का सर्वभक्षी पापी शत्रु है। 

तात्पर्य :-जब जीवात्मा भौतिक सृष्टि के सम्पर्क में आता है तो उसका शाश्वत कृष्ण -प्रेम रजोगुण की संगति  से काम में परिणित हो जाता है। अथवा दूसरे शब्दों में,ईश्वर प्रेम का भाव काम में उसी तरह बदल जाता है जिस तरह इमली के संसर्ग से दूध दही में बदल जाता है और जब काम की संतुष्टि नहीं होती तो यह क्रोध में परिणित हो जाता है, क्रोध मोह में और मोह इस संसार में निरन्तर बना रहता है। अतः जीवात्मा का सबसे बड़ा शत्रु काम है और यह काम ही है जो विशुद्ध जीवात्मा को इस संसार ने फँसे रहने के लिए प्रेरित करता है। क्रोध तमोगुण का प्रकाट्य है। वे गुण अपने आपको क्रोध तथा अन्य रूपों में प्रकट करते हैं। अतः यदि रहने तथा कार्य करने की विधियों द्वारा रजोगुण को तमोगुण में न गिरने देकर सतोगुण तक ऊपर उठाया जाय तो मनुष्य को क्रोध में पतित होने से आध्यात्मिक आसक्ति के द्वारा बचाया जा सकता है। 

अपने नित्य वर्धमान चिदानन्द के लिए भगवान् ने अपने आपको अनेक रूपों में विस्तारित कर लिया और जीवात्माएं उनके इस चिदानन्द के ही अंश हैं। उनको भी आंशिक स्वतंत्रता प्राप्त है, किन्तु अपनी इस स्वतंत्रता का दुरुप्रयोग करके जब वे सेवा को इन्द्रियसुख में बदल देती हैं तो वे काम की चपेट में आ जाती हैं। भगवान् ने इस सृष्टि की रचना जीवात्माओं के लिए इन कामपूर्ण रूचियों की पूर्ति हेतु सुविधा प्रदान करने के निमित की और जब जीवात्माएं दीर्घकाल तक काम-कर्मों फँसे रहने के कारण पूर्णतया ऊब जाती हैं,तो वे अपना वास्तविक स्वरुप जानने के लिए जिज्ञासा करने लगाती है। 

यही जिज्ञासा वेदांत-सूत्र का प्रारम्भ है जिसमे यह कहा गया है -अथातो ब्रह्मजिज्ञासा -मनुष्य को परम तत्व की जिज्ञासा करनी चाहिए। और इस परम तत्व की परिभाषा श्रीमद्भागवत में इस प्रकार दी गयी है -जन्माद्यस्य यतोन्वयदितारतरश्च  -सारी वस्तुओं का उद्गम परब्रह्म है। अतः काम का उद्गम भी परब्रह्म से हुआ। अतः यदि काम को भगवत्प्रेम में या कृष्णभावना में परिणित कर दिया जाय,या दूसरे शब्दों में कृष्ण के लिए ही सारी इच्छाएँ  हों तो काम तथा क्रोध दोनों ही आध्यात्मिक बन सकेंगे। भगवान् राम के अनन्य सेवक हनुमान ने रावण की स्वर्णपुरी को जलाकर अपना क्रोध प्रकट किया,किन्तु ऐसा करने से वे भगवान् के सबसे बड़े भक्त बन गए। यहाँ पर भी श्रीकृष्ण अर्जुन को प्रेरित  करते हैं कि वह शत्रुओं पर अपना क्रोध भगवान् को प्रसन्न करने के लिए दिखाए। अतः काम तथा क्रोध कृष्णभावनामृत में प्रयुक्त होने पर हमारे शत्रु न रहकर मित्र बन जाते हैं।

क्रमशः !!!🙏🙏      

रविवार, 13 जून 2021

BHAGAVAD GITA 3:36

 अर्जुन उवाच 

🙏🙏

अथ केन प्रयुक्तोयं पापं चरति पूरुषः 

अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः।।३६।।

अर्जुनः उवाच -अर्जुन कहा; अथ -तब; केन -किस के द्वारा; प्रयुक्त-प्रेरित; अयम -यह; पापम-पाप; चरति-करता है; पूरुषः-व्यक्ति; अनिच्छन- न चाहते हुए; अपि-यद्द्पि; वार्ष्णेय -हे वृष्णिवंशी; बलात-बलपूर्वक; इव -मानो;नियोजितः -लगाया गया। 

अर्जुन ने कहा -हे वृष्णिवंशी ! मनुष्य न चाहते हुए भी पापकर्मों के लिए प्रेरित क्यों होता है ? ऐसा लगता है कि उसे बलपूर्वक उनमे लगाया जा रहा हो। 

तात्पर्य :-जीवात्मा परमेश्वर का अंश होने के कारण मूलतः आध्यात्मिक,शुद्ध एवं समस्त भौतिक कल्मषों से मुक्त रहता है। फलतः स्वभाव से वह भौतिक जगत के पापों में प्रवृत नहीं होता। किन्तु जब वह माया के संसर्ग में आता है,तो वह बिना झिझक के और कभी-कभी इच्छा के विरुद्ध भी अनेक प्रकार से पापकर्म करता है। अतः कृष्ण से अर्जुन का प्रश्न अत्यंत प्रत्याशापूर्ण है कि जीवों की प्रकृति विकृत क्यों हो जाती है। यद्द्पि कभी-कभी जीव कोई पाप नहीं करना चाहता,किन्तु उसे ऐसा करने के लिए बाध्य होना पड़ता है। किन्तु ये पापकर्म अन्तर्यामी परमात्मा द्वारा प्रेरित नहीं होते अपितु अन्य कारण से होते हैं, जैसा कि भगवान अगले श्लोक में बताते हैं। 

क्रमशः- 🙏🙏           

शुक्रवार, 11 जून 2021

BHAGAVAD GITA 3:35

🙏🙏 

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परमधर्मात्स्वनुष्ठितात। 

स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः।।३५।।

श्रेयान - अधिक श्रेयस्कर; स्व-धर्म:-अपने नियत कर्म; विगुणः-दोषयुक्त भी; परधर्मात -अन्यों के लिए उल्लिखित कार्यों की अपेक्षा; सु-अनुष्ठितात-भलीभाँति सम्पन्न; स्व-धर्में -अपने नियतकर्मों में; निधनम -विनाश,मृत्यु; श्रेयः -श्रेष्ठतर;पर-धर्म -अन्यों के लिए नियतकर्म; भय -आवह:-खतरनाक,डरावना। 

अपने नियतकर्मों को दोषपूर्ण ढंग से संपन्न करना भी अन्य के कर्मों को भलीभाँति करने से श्रेयस्कर है। स्वीय कर्मों को करते हुए मरना पराये कर्मों में प्रवृत होने की अपेक्षा श्रेष्ठतर है, क्योंकि अन्य किसी के मार्ग का अनुसरण भयावह होता है। 

तात्पर्य :-अतः मनुष्य को चाहिए कि वह अन्यों के लिए नियतकर्मों की अपेक्षा अपने नियतकर्मो को कृष्णभावनामृत में करे। भौतिक दृष्टि से नियतकर्म मनुष्य की मनोवैज्ञानिक दशा के अनुसार भौतिक प्रकृति के गुणों के अधीन आदिष्ट कर्म है। आध्यात्मिक कर्म गुरु द्वारा कृष्ण की दिव्य सेवा के लिए आदेशित होते हैं। किन्तु चाहे भौतिक कर्म हों या आध्यात्मिक कर्म, मनुष्य को मृत्युपर्यन्त अपने नियत कर्मों में दृढ़ रहना चाहिए। अन्य के निर्धारित कर्मों का अनुकरण नहीं करना चाहिए। आध्यात्मिक तथा भौतिक स्तरों पर ये कर्म भिन्न-भिन्न हो सकते हैं, किन्तु कर्ता के लिए किसी प्रमाणिक निर्देशन के पालन का सिद्धांत उत्तम होगा। जब मनुष्य प्रकृति  गुणों के वशीभूत हो तो उसे उस विशेष अवस्था के लिए नियमों का पालन करना चाहिए,उसे अन्यों का अनुकरण नहीं करना चाहिए। उदाहरणरार्थ,सतोगुणी ब्राह्मण कभी हिंसक नहीं होता, किन्तु रजोगुणी क्षत्रिय को हिंसक होने की अनुमति है। इस तरह क्षत्रिय के लिए हिंसा के नियमों  का पालन करते हुए विनष्ट होना जितना श्रेयस्कर है उतना अहिंसा के नियमों का पालन करने वाले ब्राह्मण का अनुकरण नहीं। हर व्यक्ति को एकाएक नहीं, अपितु क्रमशः अपने ह्रदय को स्वच्छ बनाना चाहिए। किन्तु जब मनुष्य प्रकृति के गुणों को लांघकर कृष्णभावनामृत में पूर्णतया लीन हो जाता है,तो वह प्रामाणिक गुरु के निर्देशन में सब कुछ कर सकता है। कृष्णभावनामृत की पूर्ण स्थति में एक क्षत्रिय ब्राह्मण की तरह और एक ब्राह्मण क्षत्रिय की तरह कर्म कर सकता है। दिव्य अवस्था में भौतिक जगत का भेदभाव नहीं रह जाता उदाहरणार्थ विश्वामित्र मूलतः क्षत्रिय थे, किन्तु बाद में वे ब्राह्मण हो गये। इसी  प्रकार परशुराम पहले ब्राह्मण थे,  किन्तु  बाद में क्षत्रिय बन गये। ब्रह्म में स्थित होने के कारण ही वे ऐसा कर सके, किन्तु जब तक कोई भौतिक स्तर पर रहता है, उसे प्रकृति के गुणों के अनुसार अपने कर्म करने चाहिए। साथ ही उसे कृष्णभावनामृत का पूरा बोध होना चाहिए।

क्रमशः !!!🙏🙏                                                                                                                                             

बुधवार, 9 जून 2021

BHAGAVAD GITA 3:34

🙏🙏 

इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ। 

तयोर्न वशमाग्च्छेतौ ह्यस्य परिपन्थिनौ।।३४।।

इन्द्रियस्थ -इन्द्रिय का; इन्द्रियस्य अर्थे -इन्द्रियविषयों में; राग -आसक्ति; द्वेषो -तथा विरक्ति; व्यवस्थितौ-नियमों के अधीन; तयोः -उनके; न -कभी नहीं; वशम-नियंत्रण में; आगच्छेत -आना चाहिए; तौ -वे दोनों; हि -निश्चय ही; अस्य -उसका; परिपन्थिनौ -अवरोधक। 

प्रत्येक इन्द्रिय तथा उसके विषय से सम्बंधित राग-द्वेष को व्यवस्थित करने के नियम होते हैं। मनुष्य को ऐसे राग तथा द्वेष के वशीभूत नहीं होना चाहिए क्योंकि ये आत्म-साक्षात्कार के मार्ग में अवरोधक हैं।

तात्पर्य:- जो लोग कृष्णभावनाभावित हैं, वे स्वभाव से भौतिक इन्द्रियतृप्ति में रत होने में  झिझकते हैं। किन्तु जिन लोगों की ऐसी भावना न हो उन्हें शास्त्रों के यम-नियमों का पालन करना चाहिए। अनियंत्रित इन्द्रिय-भोग ही भौतिक बन्धन का कारण है, किन्तु जो शास्त्रों के यम-नियमों का पालन करता है,वह इन्द्रिय विषयों में नहीं फँसता। उदाहरणार्थ,यौन -सुख बद्धजीव के लिए आवश्यक है और विवाह -सम्बन्ध के अन्तर्गत यौन सुख की छूट दी जाती है। शास्त्रीय आदेशों के अनुसार अपनी पत्नी के अतिरिक्त अन्य किसी स्त्री के साथ यौन-सम्बन्ध वर्जित है,अन्य सभी स्त्रियों को अपनी माता मानना चाहिए। किन्तु इन आदेशों के होते हुए भी मनुष्य अन्य स्त्रियों के साथ यौन-सम्बन्ध स्थापित करना चाहता है। इन प्रवृतियों को दमित करना होगा अन्यथा वे आत्म-साक्षात्कार के मार्ग में बाधक होंगी। जब तक यह भौतिक शरीर रहता है तब तक शरीर की आवश्यकताओं को यम-नियमों के अन्तर्गत पूर्ण करने की छूट दी जाती है। किन्तु फिर भी हमें ऐसी छूटों के नियंत्रण पर विश्वास नहीं करना चाहिए। मनुष्य को अनासक्त रहकर इन यम-नियमों का पालन करना होता है,क्योंकि नियमों के अन्तर्गत इन्द्रियतृप्ति का अभ्यास भी उसे पथभ्रष्ट कर सकता है, जिस प्रकार कि राजमार्ग तक में दुर्घटना की सम्भावना बनी रहती है। भले ही इन मार्गों की कितनी ही सावधानी से देखभाल क्यों न की जाय, किन्तु इसका कोई आश्वासन नहीं दे सकता कि सबसे सुरक्षित मार्ग पर कोई खतरा नहीं होगा। भौतिक संगति के कारण अत्यंत दीर्घकाल से इन्द्रियसुख की भावना कार्य करती रही है। अतः नियमित इन्द्रिय-भोग के बावजूद भी गुमराह होने की हर सम्भावना बनी रहती है, अतः सभी प्रकार से नियमित इन्द्रिय-भोग के लिए किसी भी आसक्ति से बचना चाहिए। लेकिन कृष्णभावनामृत ऐसा है कि इसके प्रति आसक्ति से या सदैव कृष्ण की प्रेमाभक्ति में कार्य करते रहने से सभी प्रकार के इंद्रिय कार्यों से विरक्ति हो जाती है। अतः मनुष्य को चाहिए कि वह किसी भी अवस्था में कृष्णभावनामृत से विरक्त होने की चेष्टा न करे। समस्त प्रकार की इन्द्रिय -आसक्ति से विरक्ति का उद्देश्य अंततः कृष्णभावनामृत के पद पर आसीन होना है। 

क्रमशः !!!🙏🙏


शुक्रवार, 4 जून 2021

BHAGAVAD GITA 3:33

🙏🙏

 सदृशं चेष्टते स्वयाः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि। 

पकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति।।३३।। 

सदृशं -अनुसार; चेष्टते -चेष्टा करता है; स्वस्याः -अपने; प्रकृते -गुणों से; ज्ञान -वान -विद्वान्; अपि -यद्द्पि; प्रकृतिम -प्रकृति को; यान्ति-प्राप्त होते हैं; भूतानि -सारे प्राणी; निग्रहः -दमन; किम -क्या; करिष्यति -कर सकता है। 

ज्ञानी पुरुष भी अपनी प्रकृति के अनुसार कार्य करता है,क्योंकि सभी प्राणी तीनों गुणों से प्राप्त अपनी प्रकृति का ही अनुसरण करते हैं। भला दमन से क्या हो सकता है ?

तात्पर्य :-कृष्णभावनामृत के दिव्य पद पर स्थित हुए बिना प्रकृति के गुणों के प्रभाव से मुक्त नहीं हुआ जा सकता, जैसा कि स्वयं भगवान् ने सातवें अध्याय में (७.१४ )कहा है। अतः सांसारिक धरातल पर बड़े से बड़े शिक्षित व्यक्ति के लिए केवल सैद्धांतिक ज्ञान से आत्मा को शरीर से पृथक करके माया के बन्धन से निकल पाना असम्भव है। ऐसे अनेक तथाकथित अध्यात्मवादी हैं, जो अपने को विज्ञान में बढ़ा-चढ़ा मानते हैं, किन्तु भीतर-भीतर वे पूर्णतया प्रकृति के गुणों के अधीन रहते हैं, जिन्हे जीत पाना कठिन है। ज्ञान की दृष्टि से कोई कितना ही विद्वान् क्यों न हो,किन्तु भौतिक प्रकृति की दीर्घकालीन संगति के कारण वह बंधन में रहता है। कृष्णभावनामृत उसे भौतिक बन्धन से छूटने में सहायक होता है,भले ही कोई अपने नियतकर्मों के करने में संलग्न क्यों न रहे। अतः पूर्णतया कृष्णभावनाभावित हुए बिना नियतकर्मों का परित्याग नहीं करना चाहिए। किसी को भी सहसा अपने नियतकर्म त्यागकर तथाकथित योगी या कृत्रिम अध्यात्मवादी नहीं बन जाना चाहिए। अच्छा तो यह होगा कि यथास्थिति में रहकर श्रेष्ठ प्रशिक्षण के अन्तर्गत कृष्णभावनामृत प्राप्त करने का प्रयत्न किया जाय। इस प्रकार कृष्ण की माया के बन्धन से मुक्त हुआ जा सकता है। 

क्रमशः!!!🙏🙏 

गुरुवार, 3 जून 2021

BHAGAVAD GITA 3:32

 🙏🙏

ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति में मतम। 

सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि  नष्टानचेतसः।।३२।। 

ये -जो; तु -किन्तु; एतत -इस; अभ्यसूयंतः ईर्ष्यावश; न -नहीं; अनुतिष्ठन्ति -नियमित रूप से संपन्न करते हैं; में -मेरा; मतम -आदेश; सर्व -ज्ञान -सभी प्रकार के ज्ञान में;विमूढान -पूर्णतया दिग्भ्र्मित; तान -उन्हें; विद्धि -ठीक से जानो; नष्टान -नष्ट हुए; अचेतसः -कृष्णभावनामृत रहित। 

किन्तु जो ईर्ष्यावश इन उपदेशों की उपेक्षा करते हैं और इनका पालन नहीं करते उन्हें समस्त ज्ञान से रहित,दिग्भ्र्मित तथा सिद्धि के प्रयासों में नष्ट -भ्र्ष्ट समझना चाहिए। 

तात्पर्य :-यहाँ पर कृष्णभावनाभावित न होने के दोष का स्पष्ट कथन है। जिस प्रकार परम अधिशासी की आज्ञा के उल्लंघन के लिए दण्ड होता है,उसी प्रकार भगवान् के आदेश के प्रति अवज्ञा के लिए भी दण्ड है। अवज्ञाकारी व्यक्ति चाहे कितना ही बड़ा क्यों न हो वह शून्यह्रदय होने से आत्मा के प्रति तथा  परब्रह्म,परमात्मा एवं श्रीभगवान के प्रति अनभिज्ञ रहता है। अतः ऐसे व्यक्ति से जीवन की सार्थकता की आशा नहीं की जा सकती। 

क्रमशः!!!🙏🙏 

बुधवार, 2 जून 2021

BHAGAVAD GITA 3:31

🙏🙏

ये में मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः। 

श्रद्धावन्तोनसूयन्तो मुच्यन्ते तेपि कर्मभिः।।३१।। 

ये -जो; में -मेरे; मतम -आदेशों को; इदम -इन; नित्यम -नित्य कार्य के रूप में; अनुतिष्ठन्ति -नियमित रूप से पालन करते हैं; मानवाः-मानव प्राणी; श्रद्धा-वन्तः -श्रद्धा तथा भक्ति समेत; अनसूयन्तः -बिना ईर्ष्या के; मुच्यन्ते -मुक्त हो जाते हैं; ते -वे; अपि -भी; कर्मभिः सकामकर्मों के नियमरूपी बन्धन से। 

जो व्यक्ति मेरे आदर्शों के अनुसार अपना कर्तव्य करते रहते हैं और ईर्ष्या रहित होकर इस उपदेश का श्रद्धापूर्वक पालन करते हैं,  वे सकाम कर्मों के बन्धन से मुक्त हो जाते हैं। 

तत्पर्य :-श्री भगवान् कृष्ण का उपदेश समस्त वैदिक ज्ञान का सार है,अतः किसी अपवाद के बिना यह शाश्वत सत्य है। जिस प्रकार वेद शाश्वत हैं उसी प्रकार कृष्णभावनामृत का यह सत्य भी शाश्वत  है। मनुष्य को  चाहिए कि भगवान् से ईर्ष्या किये बिना इस आदेश में दृढ़ विश्वास रखे। ऐसे अनेक दार्शनिक हैं,जो भगवदगीता पर टीका रचते हैं,किन्तु कृष्ण में कोई श्रद्धा नहीं रखते। वे कभी सकाम कर्मों के बन्धन से मुक्त नहीं हो सकते। किन्तु एक सामान्य पुरुष भगवान्  के इन आदेशों में दृढ़विश्वास करके कर्म -नियम के बन्धन से मुक्त हो जाता है, भले ही वह इन आदेशों का ठीक से पालन न कर पाए। कृष्णभावनामृत के प्रारम्भ में भले ही कृष्ण के आदेशों का पूर्णतया पालन न हो पाए,किन्तु चूँकि मनुष्य इस नियम से रुष्ट नहीं होता और पराजय तथा निराशा का विचार किये बिना निष्ठापूर्वक कार्य करता है,अतः वह विशुद्ध कृष्णभावनामृत को प्राप्त होता है। 

क्रमशः !!!🙏🙏  

मंगलवार, 1 जून 2021

BHAGAVAD GITA 3:30

 🙏🙏

मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याधातमच्चेतमा। 

निराशीरनिंर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः।।३०।।

मयि-मुझमे; सर्वाणि -सब तरह से; कर्माणि -कर्मों को; सन्यस्थ -पूर्णतया त्याग करके; अध्यात्म -पूर्ण आत्मज्ञान से युक्त; चेतसा -चेतना से; निराशी -लाभ की आशा से रहित, निष्काम; निर्ममः -स्वामित्व की भावना से रहित, ममता त्यागी; भूत्वा -होकर; युध्यस्व -लड़ो; विगत -ज्वरः -आलस्यरहित। 

अतः हे अर्जुन ! अपने सारे कार्यों को मुझमे समर्पित करके मेरे पूर्ण ज्ञान से युक्त होकर,लाभ की आकांक्षा से रहित, स्वामित्व के किसी दावे के बिना  आलस्य से रहित होकर युद्ध करो। 

तात्पर्य :-यह श्लोक भगवदगीता के प्रयोजन को स्पष्टतया इंगित करने वाला है। भगवान् की शिक्षा है कि स्वधर्म पालन के लिए सैन्य अनुशासन के सदृश्य पूर्णतया कृष्णभावनाभावित होना आवश्यक है। ऐसे आदेश से कुछ कठिनाइयां उपस्थित हो सकती हैं, फिर भी कृष्ण के आश्रित होकर स्वधर्म का पालन करना ही चाहिए,क्योंकि यह जीव की स्वाभाविक स्थिति है। जीव भगवान् के सहयोग के बिना सुखी नहीं हो सकता क्योंकि जीव की नित्य स्वाभाविक स्थिति ऐसी है कि भगवान् की इच्छाओं के अधीन रहा जाय। अतः श्रीकृष्ण ने अर्जुन को युद्ध करने का इस तरह आदेश दिया मानो भगवान् उसके सेनानायक हों। परमेश्वर की इच्छा के लिए मनुष्य को सर्वस्व की बलि करनी होती है और साथ ही स्वामित्व जताये बिना स्वधर्म का पालन करना होता है। अर्जुन को भगवान् के आदेश का मात्र पालन करना था। परमेश्वर समस्त आत्माओं के आत्मा हैं, अतः जो पूर्णतया परमेश्वर पर आश्रित रहता है या दूसरे शब्दों में,जो पूर्णतया कृष्णभावनाभावित है वह अध्यात्मचेतस कहलाता है। निराशीः का अर्थ है स्वामी के आदेशानुसार कार्य करना किन्तु फल की आशा न करना। कोषाध्यक्ष अपने स्वामी के लिए लाखों रूपये गिन सकता है,किन्तु इसमें से वह अपने लिए एक पैसा भी नहीं चाहता। इसी प्रकार मनुष्य को यह समझना चाहिए कि इस संसार में किसी व्यक्ति का कुछ भी नहीं है,सारी वस्तुएं परमेश्वर की हैं। मयि -अर्थात मुझमे वास्तविक तात्पर्य यही है। और जब मनुष्य इस प्रकार से कृष्णभावनामृत में कार्य करता है तो वह किसी वस्तु पर अपने स्वामित्व का दावा नहीं करता। यह भावनामृत निर्मम अर्थात "मेरा  कुछ नहीं है " कहलाता है। यदि ऐसे कठोर आदेश को, जो शारीरिक सम्बन्ध में तथाकथित बंधुत्व भावना से रहित है, पूरा करने में कुछ झिझक हो तो उसे दूर कर देना चाहिए। इस प्रकार मनुष्य विगतज्वर अर्थात ज्वर तथा आलस्य से रहित हो सकता है। अपने गुण तथा स्थिति के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को विशेष प्रकार का कार्य करना होता है और ऐसे कर्तब्यों का पालन कृष्णभावनाभावित होकर किया जा सकता है। इससे मुक्ति का मार्ग प्रशस्त हो जायेगा। 

क्रमशः !!!🙏🙏

सोमवार, 31 मई 2021

BHAGAVAD GITA 3:29

🙏🙏 

प्रकृतेर्गुणसम्मूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु। 

तानकृतस्रविदो मन्दांकृतसवित्र विचालयेत।।२९।।

प्रकृते -प्रकृति  के;  गुण-गुणों से; सम्मूढा -भौतिक पहचान से बेवकूफ बने हुए; सज्जन्ते -लग जाते हैं; गुण -कर्मसु -भौतिक कार्यों में; तान -उन; अकृतस्त्र-विदः -अल्पज्ञानी पुरुष; मन्दान -आत्म -साक्षात्कार समझने में आलसियों को; कृतस्र -वित् -ज्ञानी; न -नहीं; विचालयेत -विचलित करने का प्रयत्न करना चाहिए। 

माया के गुणों से मोहग्रस्त होने पर अज्ञानी पुरुष पूर्णतया भौतिक कार्यों में संलग्न रहकर उनमे आसक्त हो जाते हैं। यद्द्पि उनके ये कार्य उनमे ज्ञानाभाव के कारण अधम होते हैं,किन्तु ज्ञानी को चाहिए कि उन्हें विचलित न करे। 

तात्पर्य :-अज्ञानी पुरुष स्थूल भौतिक चेतना से और उपाधियों से पूर्ण रहते हैं। यह शरीर प्रकृति की देन है और जो व्यक्ति शारीरिक चेतना में अत्यधिक आसक्त होता है वह मन्द अर्थात आलसी कहा जाता है। अज्ञानी मनुष्य शरीर को आत्मस्वरूप मानते हैं,वे अन्यों के साथ शारीरिक सम्बन्ध को बंधुत्व मानते हैं , जिस देश में यह शरीर प्राप्त  हुआ है उसे वे पूज्य मानते हैं और वे धार्मिक अनुष्ठानो की औपचारिकताओं को ही अपना लक्ष्य मानते हैं। ऐसे भौतिकताग्रस्त उपाधिधारी पुरुषों के कुछ प्रकार के कार्यों में सामाजिक सेवा,राष्ट्रीयता तथा परोपकार है। ऐसी उपाधियों के चक्कर में वे सदैव भौतिक क्षेत्र में व्यस्त रहते हैं,उनके लिए आध्यात्मिक बोध मिथ्या है, अतः वे रूचि नहीं लेते। किन्तु जो लोग आध्यात्मिक जीवन में जागरूक हैं, उन्हें चाहिए कि इस तरह भौतिकता में मग्न व्यक्तियों को विचलित न करें। अच्छा तो यही होगा कि वे शांतभाव से अपने आध्यात्मिक कार्यों को करें। ऐसे मोहग्रस्त व्यक्ति अहिंसा जैसे जीवन के मूलभूत नैतिक सिद्धांतो तथा इसी प्रकार कार्यों में लगे हो सकते हैं। 

जो लोग अज्ञानी हैं वे कृष्णभावनामृत के कार्यों को समझ नहीं पाते,अतः भगवान् कृष्ण हमें उपदेश देते हैं कि ऐसे लोगों को विचलित न किया जाय और व्यर्थ ही मूल्यवान समय नष्ट न  किया जाय। किन्तु भगवद्भक्त भगवान् से भी अधिक दयालु होते हैं, क्योंकि वे भगवान् के अभिप्राय को समझते हैं। फलतः वे सभी प्रकार के संकट झेलते हैं, यहाँ तक कि वे अज्ञानी पुरुषों के पास जा-जा कर उन्हें कृष्णभावनामृत के कार्यों में प्रवृत करने का प्रयास करते हैं,जो मानव के लिए परमावश्यक है। 

क्रमशः !!!🙏🙏 

शनिवार, 29 मई 2021

BHAGAVAD GITA 3:28

 🙏🙏तत्ववितु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः। 

गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सञ्जते।।२८।।

तत्व-वित् -परम सत्य को जानने वाला; तु-लेकिन;महाबाहो -हे विशाल भुजाओं वाले; गुण -कर्म -भौतिक प्रभाव के अन्तर्गत कर्म के; विभागयोः -भेद के; गुणाः -इन्द्रियां; गुणेषु -इन्द्रियतृप्ति में; वर्तन्ते -तत्पर रहती हैं; इति इस प्रकार; मत्वा -मानकर; न -कभी नहीं;सञ्जते -आसक्त रहता है। 

हे महाबाहो ! भक्तिभाव कर्म तथा सकाम कर्म के भेद को भलीभांति जानते हुए जो परम सत्य को जानने वाला है,वह कभी भी अपने आप को इन्द्रियों में तथा इन्द्रियतृप्ति में नहीं लगाता। 

तात्पर्य :-परम सत्य को जानने वाला भौतिक संगति में अपनी विषम स्थिति को जानता है। वह जानता है कि वह भगवान् कृष्ण का अंश है और उसका स्थान इस भौतिक सृष्टि में नहीं होना चाहिए। वह अपने वास्तविक स्वरुप को भगवान् के अंश के रूप में जानता है जो सत चित आनंद है और उसे यह अनुभूति होती रहती है कि " मैं किसी कारण से देहात्मबुद्धि में फंस चुका हूँ। " अपने अस्तित्व की शुद्ध अवस्था में उसे सारे कार्य भगवान् कृष्ण की सेवा में नियोजित करने चाहिए। फलतः वह अपने आपको कृष्णभावनामृत के कार्यों में लगाता है  और भौतिक इन्द्रियों के कार्यों के प्रति स्वभावतः अनासक्त हो जाता है क्यों कि ये परिस्थितिजन्य तथा अस्थायी  है।  वह जानता है कि उसके जीवन की भौतिक दशा भगवान् के नियंत्रण में हैं, फलतः वह सभी प्रकार के भौतिक बन्धनों से विचलित नहीं होता क्योंकि वह इन्हे भगवत्कृपा मानता है। श्रीमद्भागवत के अनुसार जो व्यक्ति परम सत्य को ब्रह्म,परमात्मा तथा श्री भगवान् -इन तीनों विभिन्न रूपों में जानता है वह तत्ववित्त कहलाता है,क्योंकि वह परमेश्वर के साथ अपने वास्तविक सम्बन्ध के जानना। 

क्रमशः !!! 🙏🙏

गुरुवार, 27 मई 2021

BHAGAVAD GITA 3:27

🙏🙏

प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः। 

अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते।।२७।।

प्रकृतेः-प्रकृति का; क्रियमाणानि -किये जाकर; गुणैः - गुणों के द्वारा; कर्माणि -कर्म; सर्वशः-सभी प्रकार के; अहङ्कार -विमूढ़ -अहंकार से मोहित; आत्मा -आत्मा; करता -करने वाला; अहम् -मैं हूँ; इति -इस प्रकार; मन्यते -सोचता है। 

जीवात्मा अहंकार के प्रभाव से मोहग्रस्त होकर अपने आपको समस्त कर्मों का कर्ता  मान बैठता है, जब कि वास्तव में प्रकृति के तीनों गुणों द्वारा संपन्न किये जाते हैं। 

तात्पर्य :-दो व्यक्ति जिनमे से एक कृष्णभावनाभावित है और दूसरा भौतिक चेतना वाला है,सामान स्तर पर कार्य करते हुए समान पद पर प्रतीत हो सकते हैं,किन्तु अनके पदों में आकाश -पाताल का अंतर रहता है। भौतिक चेतना वाला व्यक्ति अहंकार के कारण आश्वस्त रहता है कि वही सभी वस्तुओं का कर्ता है। वह यह नहीं जानता  कि शरीर की रचना प्रकृति द्वारा हुई है, जो परमेश्वर की अध्यक्षता में कार्य करती है। भौतिकवादी व्यक्ति यह नहीं जानता अंततोगत्वा कि वह कृष्ण के अधीन है। अहंकारवश ऐसा व्यक्ति हर कार्य को स्वतंत्र रूप से करने का  श्रेय लेंना चाहता है और यही है उसके अज्ञान का लक्षण।

उसे यह ज्ञात नहीं है कि उसके इस स्थूल तथा सूक्ष्म शरीर की रचना प्रकृति द्वारा भगवान् की अध्यक्षता में की गयी है, अतः उसके सारे शारीरिक तथा मानसिक कार्य कृष्णभावनामृत में रहकर कृष्ण की सेवा में तत्पर होने चाहिए। अज्ञानी व्यक्ति यह भूल जाता है कि भगवान् हृषिकेश कहलाते हैं अर्थात वे शरीर के इन्द्रियों के स्वामी हैं। इन्द्रियतृप्ति के लिए इन्द्रियों का निरंतर उपयोग करते रहने से वह अहंकार के कारण वस्तुतः मोहग्रस्त रहता है, जिससे वह कृष्ण के साथ अपने शाश्वत सम्बन्ध को भूल जाता है।

क्रमशः !!! 🙏🙏